फिलाटेक्स इंडिया: तानाबाना दुरुस्त

यूं तो हर मां को अपना काना बेटा भी सबसे खूबसूरत लगता है। लेकिन प्रवर्तक को अपनी कंपनी के बारे में ऐसा कोई भ्रम नहीं होता। असल में, प्रवर्तक से ज्यादा अपनी कंपनी की सही औकात कोई नहीं समझता। वह अंदर की सूचनाओं के आधार पर कोई खेल न कर दे, इसीलिए इनसाइडर ट्रेडिंग का नियम बना हुआ है। इसलिए प्रवर्तक अपनी कंपनी के शेयर जिस भाव पर खुद खरीद रहे हों या किसी और को बेच रहे हों, उसे वाजिब मूल्य माना जाना चाहिए।

टेक्सटाइल उद्योग की कंपनी फिलाटेक्स इंडिया के निदेशक बोर्ड ने हाल ही अपने 28,58,603 शेयर 50 रुपए प्रति शेयर की दर से छह गैर-प्रवर्तकों को प्रिफरेंशियल तरीके से बेचने का फैसला किया है। इस फैसले को अगले सोमवार, 4 जुलाई को कंपनी की एजीएम (सालाना आमसभा) में शेयरधारकों का अनुमोदन मिलने के बाद लागू किया जाएगा। कंपनी के शेयरधारकों की वर्तमान संख्या 5175 है। प्रिफरेंशियल इश्यू के बाद इनकी संख्या 5181 हो जाएगी। साथ ही कंपनी की इक्विटी पूंजी 17.14 करोड़ रुपए से बढ़कर पूरी 20 करोड़ रुपए हो जाएगी, जिसमें इन छह गैर-प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 7.07 फीसदी होगी।

ये छह गैर-प्रवर्तक निवेशक हैं – आरएमपी होल्डिंग (9 लाख शेयर), एएनएम फिनकैप (5 लाख शेयर), निशीत फिनकैप (4 लाख शेयर), श्री गणेश प्रोजेक्ट (2 लाख शेयर), सॉमरसेट एमर्जिंग अपॉरच्यूनिटी फंड (7 लाख शेयर) और शिव कुमार सिंघल (1,58,603 शेयर)। इसमें से सॉमरसेट एमर्जिंग अपॉरच्यूनिटी फंड के पास पहले से ही कंपनी के 9.02 लाख (5.26 फीसदी) शेयर हैं। इश्यू के बाद इनकी मात्रा 16.02 लाख (8.01 फीसदी) हो जाएगी। वैसे दिलचस्प बात यह है कि 71 करोड़ रुपए के बाजार पूंजीकरण वाली इस कंपनी में एफआईआई ने 9.93 फीसदी और डीआईआई ने 2.87 फीसदी इक्विटी ले रखी है। उसके बड़े शेयरधारकों में आईडीबीआई बैंक (2.50 फीसदी), डफ्लाघर इनवेस्टमेंट्स (4.67 फीसदी), मॉरीशस की अमास इंडिया इनवेस्टमेंट्स (4.67 फीसदी), रेलिगेयर सिक्यूरिटीज (1.31 फीसदी) और रेमकॉम सेल्स सर्विसेज (2.22 फीसदी) शामिल हैं।

कंपनी की इक्विटी में प्रवर्तकों की मौजूदा हिस्सेदारी 50.28 फीसदी है। लेकिन उन्होंने पिछले साल मार्च में 40 लाख वारंट भी लिए हैं जिन्हें 40 रुपए मूल्य पर शेयरों में बदला जाएगा। इन्हें बदलने के बाद कंपनी की इक्विटी 21.14 करोड़ रुपए हो जाएगी जिसमें प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 59.68 फीसदी रहेगी। अगर इसमें नए प्रिफरेंशियल इश्यू को भी जोड़ दें तो कंपनी की कुल इक्विटी 24 करोड़ रुपए हो जाएगी, जिसमें प्रवर्तकों की हिस्सेदारी 52.58 फीसदी रहेगी। इस सारे हिसाब-किताब का मतलब यह दिखाना है कि प्रवर्तक कंपनी के शेयर औरों के बेचने के साथ सुनिश्चित रखना चाहते हैं कि उनकी हिस्सेदारी 50 फीसदी से नीचे न जाए।

अब आते हैं असली बात पर। कंपनी के शेयर केवल बीएसई (कोड – 526227) में लिस्टेड हैं और उसका दस रुपए अंकित मूल्य का शेयर इस समय 42.05 रुपए चल रहा है। इसी साल 10 फरवरी 2011 को यह 52 हफ्ते के न्यूनतम स्तर 28.25 रुपए पर जा चुका है, जबकि इसका 52 हफ्ते का उच्चतम स्तर 92.05 रुपए है जो इसने 30 जुलाई 2010 को हासिल किया था।

कंपनी ने दो महीने पहले 30 अप्रैल को ही वित्त वर्ष 2010-11 के सालाना नतीजे घोषित कर दिए थे। इनके अनुसार उसकी बिक्री 21.68 फीसदी बढ़कर 486.42 करोड़ रुपए और शुद्ध लाभ 10.59 फीसदी बढ़कर 19.01 करोड़ रुपए हो गया है। उसका वर्तमान ईपीएस (प्रति शेयर मुनाफा) 11.09 रुपए है। इस तरह 42.05 रुपए के मौजूदा बाजार भाव पर उसका शेयर केवल 3.79 के पी/ई पर ट्रेड हो रहा है, जबकि शेयर की बुक वैल्यू ही 61.03 रुपए है। सवाल उठता है कि क्या इसमें निवेश करना फायदे का सौदा होगा या इसे लेकर फंसने का खतरा है?

भाव तो एकदम वाजिब लगता है। साल भर पहले प्रवर्तकों ने 40 रुपए में खरीदा था। अभी गैर-प्रवर्तक इसका 50 रुपए मूल्य दे रहे हैं। सीएनआई रिसर्च का कहना है कि इसे 65 रुपए के लक्ष्य के साथ खरीद लिया जाना चाहिए क्योंकि चालू वित्त वर्ष 2011-12 में कंपनी की पहली तिमाही के नतीजे शानदार रहनेवाले हैं। खैर, यह तिमाही खत्म होने में बस तीन दिन बाकी हैं और इसके नतीजे 15-20 दिन में आ जाएंगे। लेकिन मुझे लगता है कि इतनी छोटी अवधि में करीब 30 फीसदी रिटर्न पाने की लालच के बजाय हमें यह देखना चाहिए कि क्या फिलाटेक्स में लंबे समय के लिए निवेश करना सही रहेगा।

कंपनी साल 1994 से सिंथेटिक यार्न और टेक्सटाइल्स के धंधे में है। इसका प्रवर्तन मूलतः राजस्थान के झुंझुनू (राजस्थान) के उद्यमी परिवार से जुड़े मधु सूदन भगेरिया, पुरुषोत्त्म भगेरिया और माधव भगेरिया ने किया है। भगेरिया परिवार फिलहाल 40 सालों से दिल्ली में है। ये लोग लंबे समय से सिंथेटिक फिलामेंट यार्न के व्यापारी रहे हैं और जे के सिंथेटिक्स, परसरामपुरिया सिंथेटिक्स व जेसीटी जैसी तमाम बड़ी कंपनियों के प्रमुख डीलर रहे हैं। कहने का मतलब यह है कि प्रवर्तक अपने धंधे की रग-रग से वाकिफ हैं। उनकी दो उत्पादन इकाइयां नोएडा (उत्तर प्रदेश) और दादरा (दादरा नगर हवेली) में हैं। कंपनी भारत में मोनो फिलामेंट यार्न बनानेवाली प्रमुख कंपनियों में शुमार है। उसने टेक्नोलॉजी जर्मनी की मशहूर कंपनियों से ले रखी है।

बाजार की जरूरत के हिसाब से कंपनी क्षमता बढ़ाती और इकाई लगाती रही है। फिलहाल वह दहेज के गुजरात औद्योगिक विकास निगम के परिसर में पॉलिएस्टर पॉली-कंडेंसेशन व पार्शियली ओरिएंटेड यार्न (पीओवाई) की नई परियोजना लगा रही है, जिसके चालू वित्त वर्ष 2011-12 की आखिरी तिमाही यानी जनवरी-मार्च 2012 तक पूरी हो जाने की उम्मीद है। इसके खर्च के इंतजाम के लिए प्रवर्तकों को जारी परिवर्तनीय वारंटों से 16 करोड़ में से 13.20 करोड़ रुपए की रकम कंपनी को मिल चुकी है जिससे परियोजना के लिए जमीन, बिल्डिंग, और संयंत्र व मशीनरी की खरीद का काम कर लिया गया है।

ज्यादा विस्तार में न जाकर हम इतना कह सकते हैं कि यार्न और टेक्सटाइल के धंधे की बारीकियां समझनेवाले प्रवर्तक कंपनी को सुनियोजित विकास की दिशा में लेकर जा रहे हैं। उनके व्यापारिक रिश्ते मजबूत हैं। तभी तो वे गैर-प्रवर्तकों को भी पकड़कर प्रिफरेंशियल इश्यू के जरिए कंपनी के लिए आसानी से करीब 9.50 करोड़ रुपए जुटा ले रहे हैं। कंपनी भले ही स्माल कैप की श्रेणी में आती हो। लेकिन इसमें विकास की विशद संभावना है। लेकिन इसका शेयर इसी अनुपात में बढ़ेगा या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता। फिर भी घरेलू खपत पर आधारित इस कंपनी पर दांव लगाया जा सकता है। हां, अंत में एक सावधानी। इसी तरह के नाम की एक अन्य कंपनी है, हैदराबाद की फिलाटेक्स फैशंस जिससे दूर रहने की जरूरत है।

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