देश के कम से कम 12.1 करोड़ युवा निठल्ले बैठे हैं। 81.35 करोड़ लोग हर महीने सरकार से मिलनेवाले पांच किलो मुफ्त राशन के मोहताज़ हैं। 9.45 करोड़ स्वाभिमानी किसानों की कमर ऐसी टूटी है कि सरकार से साल भर में 6000 रुपल्ली की सम्मान-निधि पाकर लाभार्थी बन गए। वित्त मंत्री सीतारमण विदेश जाकर भारतीय मध्यवर्ग को बेच रही हैं। कुछ दिन पहले फ्रांस में उन्होंने बताया कि भारतीय मध्यवर्ग 1995 से औसतन हर साल 6.3% बढ़औरऔर भी

देश में इस वक्त 12.1 करोड़ युवा ऐसे हैं जो न तो पढ़ रहे हैं और न ही किसी रोज़गार या ट्रेनिंग में लगे हैं। 2012 से 2024 तक युवा बेरोजगारों की संख्या तीन गुनी हो गई। जो आज तक दुनिया की किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में नहीं हुआ, वो भारत में हो चुका है। यहां 2020 से 2024 के बीच उद्योग-धधों से निकलकर आठ करोड़ मजदूर वापस खेती-किसानी में लौट गए। भारत की यह दारुण हकीकतऔरऔर भी

मोदी सरकार एक तरफ स्वदेशी, आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन इंडिया का राग अलाप रही है, दूसरी तरफ स्थिति यह है कि देश का 30.8% औद्योगिक माल चीन से बनकर आ रहा है। वित्त मंत्रालय ने कई साल से सीमावर्ती देशों की कंपनियों पर हमारे सरकारी टेंडरों में भाग लेने पर बंदिशें लगा रखी हैं। लेकिन अचानक 24 जून को मंत्रालय ने आदेश जारी करके भारत में फैक्ट्रियां चला रही चीन की चार कंपनियों को ऐसी बंदिशों सेऔरऔर भी

इसे देश की आर्थिक आपदा कहें या अर्थव्यवस्था में बढ़ रहा असंतुलन। इसका मूल आधार है मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का ठहराव और जीडीपी में उसके योगदान का घटते जाना। विश्व बैंक के डेटा के मुताबिक 2015 में हमारे जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा 16% हुआ करता था। यह 2025 तक घटकर 13% रह गया है। इसी दौरान इंडोनेशिया के जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग का हिस्सा बढ़कर 19%, मलयेशिया में 23% और वियतनाम में 24% हो गया। बता दें किऔरऔर भी

रुपए का गिरना, रोज़गार का घटना, भ्रष्टाचार का बढ़ना, अमीरों का और ज्यादा अमीर और गरीबों का और ज्यादा गरीब होते जाना। यह सारा कुछ हमारी अर्थव्यवस्था में पनपते भयंकर असंतुलन के लक्षण हैं। फिर भी अर्थव्यवस्था की बीमारी अभी असाध्य नहीं हुई है। इस बीमारी के स्वरूप को ऊपरी तौर पर तीन विकासक्रमों से समझा जा सकता है। एक, महंगे फोन और कंप्यूटर बेचनेवाली कंपनी एप्पल इंडिया की आय रोजमर्रा के आम उपभोक्ता सामान बेचनेवाली देशऔरऔर भी