डोनाल्ड ट्रम्प के जवाबी टैरिफ पर मेक्सिको, कनाडा, यूरोपीय संघ और चीन से लेकर वियतनाम व बांग्लादेश तक पलटकर वार कर रहे हैं। लेकिन भारत सरकार चुप है। अधिकारिक सूत्रों के हवाले कहा जा रहा है कि भारत को ज्यादा चिंतित होने की ज़रूरत नहीं क्योंकि उसके प्रतिस्पर्धी देशों पर ज्यादा टैरिफ लगाया गया है जिसका फायदा हमें मिलेगा। वे इस हकीकत को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं कि अमेरिका में होनेवाले आयात में भारत काऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश से लम्बे समय में अच्छा कमाने के लिए समय पर अच्छे स्टॉक्स चुनने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है गलत स्टॉक्स को गलत भाव पर खरीदकर फंसने से बचना। गलतियों से बचेंगे तो ठीकठाक कंपनियों के शेयर चार-पांच साल में आराम से 12-14% की सालाना चक्रवृद्धि दर (सीएजीआर) से रिटर्न दे देते हैं। लेकिन 20-25 स्टॉक्स के पोर्टफोलियो में पांच-दस गलत स्टॉक्स फंस गए तो बाकियों का रिटर्न भी खाकर बैठ जाते हैं। इसलिएऔरऔर भी

अमेरिका द्वारा भारत से होनेवाले आयात पर जवाबी शुल्क लगा देना कोई ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि राष्ट्रहित से जुड़ा अहम हमला है। लेकिन जिस दिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जवाबी शुल्क का ऐलान कर रहे थे, उसी दिन देश की संसद को वक्फ संशोधन बिल पर उलझा देने से जगजाहिर हो गया है कि भाजपा और मोदी सरकार के लिए राष्ट्रहित की अहमियत ज्यादा है या राजनीतिक स्वार्थ की? इस सरकार ने पहले तो बजट में अमेरिकी माल वऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को देश का प्रधानसेवक बताने से नहीं थकते। लेकिन मोदी सरकार किसकी मालिक और किसकी गुलाम हैं, इसे समझने के लिए केवल एक उदाहरण काफी है। बजट से पहले आम से लेकर खास तक, सभी लोग मांग कर रहे थे कि बीमा प्रीमियम पर लिया जा रहा 18% जीएसटी खत्म या कम कर दिया जाए। लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। वहीं, केंद्र सरकार 2016 से हीऔरऔर भी

यूं तो अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भारत को कोई खास अहमियत नहीं है। उसके कुल व्यापार में भारत का हिस्सा 2% से भी कम है। लेकिन वो भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझीदार देश है। वित्त वर्ष 2024-25 में दिसंबर 2024 तक के नौ महीनों में भारत का कुल व्यापार 868.60 अरब डॉलर रहा है, जिसमें से अमेरिका का हिस्सा 95.02 अरब डॉलर या 10.94% था। यही नहीं, इस अवधि में अमेरिका के साथ भारतऔरऔर भी