बड़ा संगीन है झांसा बढ़ी विकास दर का
हमें जीडीपी के विकास दर के झांसे को कायदे से समझना होगा। एक तो यह है कि साल के शुरू में विकास दर का बजट अनुमान होता है, जो तीन तिमाही बाद संशोधित अनुमान तक और फिर साल बीतने पर वास्तविक दर तक पहुंच जाता है। दूसरा यह है कि हमेशा विकास की एक नॉमिनल दर या सतही दर होती है जिसे मौजूदा मूल्यों पर निकाला जाता है। नॉमिनल विकास दर को जब मुद्रास्फीति के असर कोऔरऔर भी
मोदी फेंकने तो सरकार हांकने में माहिर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लम्बी-लम्बी फेंकने में माहिर व जगजाहिर हैं तो उनकी सरकार आर्थिक विकास तक में हांकने की उस्ताद बनी हुई है। जब से मोदी सरकार ने देश की सत्ता संभाली है, तब से पेश किए गए 11 बजट में से तीन (2020-21, 2021-22 और 2022-23) को कोरोना महामारी से प्रभावित और एक (2016-17) को अपवाद मानकर छोड़ दें तो बाकी सात में उसने जीडीपी की नॉमिनल विकास दर का जो अनुमान लगाया था, वास्तविक याऔरऔर भी
घोटालों के उगते रक्तबीजों से सावधान
शेयर बाजार में निवेश की सलाह देनेवाले बहुत-से जमूरे सक्रिय हैं। चढ़े हुए बाज़ार में भी कहते हैं कि उनके पास इतनी सलाहें हैं कि आप खरीदते-खरीदते थक जाओगे, तब भी कम नहीं पड़ेंगी। आगे पूछो तो ब्रोकरों की तरह उन्हीं कंपनियों के शेयर खरीदने को कहते हैं जो पहले से चढ़े हुए हैं। लालच में पड़कर अगर आप इनके झांसे में आ गए तो सालों तक पछताते रह जाएंगे। ये तो दलाली खाकर दूर निकल जाएंगेऔरऔर भी
सतह पर छिछली, असल में लगी डुबकी
इस बार की आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2023-24 में वेतनभोगी व स्वरोजगार में लगे पुरुष व महिला, दोनों ही श्रमिकों का असल मासिक वेतन कोरोना महामारी के दो साल पहले के वित्त वर्ष 2017-18 के स्तर से भी कम रहा है। असल स्थिति सतही या नॉमिनल स्थिति से मुद्रास्फीति का असर मिटाकर निकाली जाती है। आर्थिक समीक्षा में बताया गया है कि 2017-18 में पुरुष श्रमिक का असल औसत मासिक वेतन ₹12,665औरऔर भी






