फिर लालकिले की प्राचीर से साफा पहनकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण, लगातार 11वीं बार। ऐसे में 78वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व बेला पर हिसाब लगाना ज़रूरी है कि मोदी सरकार के अब तक के दस साल में देश को क्या मिला? क्या उन्होंने देश को अब तक केवल टोपी पहनाने का ही काम किया है? विकसित भारत के सपने देखना हर देशवासी का जन्मसिद्ध अधिकार है। लेकिन ऐसे ही सपने दिखाकर दस साल से बराबर छलेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में पारदर्शिता न हो, दस शेयर से लेकर दस करोड़ शेयरों तक के सौदे करनेवालों में समानता न हो, सबकी न सुनी जाए तो रिटेल निवेशक व ट्रेडर बड़े मगरमच्छों का निवाला बन जाते हैं। ऐसा न हो, इसे सुनिश्चित करने का काम पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी का है। वह ऊपर-ऊपर दिखाती भी यही है। लेकिन पता चला है कि अडाणी समूह की कंपनियों के शेयरों को जिन ऑफशोर फंडों के ज़रिए जबरन चढ़ायाऔरऔर भी

आज की विडम्बना यह है कि सत्यमेव जयते के देश में सत्य ही निर्वासित हो गया है। सरकार, उसके मंत्री-संत्री, यहां तक कि प्रधानमंत्री तक खुलेआम बेधड़क झूठ बोलते हैं। जो उनके झूठ को पकड़ने की जुर्रत करते हैं, सरकार उन पर शिकंजा कस देती है। जो बहादुर अर्थशास्त्री सरकार से सच कहने का साहस करते हैं, उन्हें भी किसी न किसी रूप में दबा दिया जाता है। बजट के ठीक एक दिन पहले फ्रांस के बैंकिंगऔरऔर भी

शेयर बाज़ार बड़ा समदर्शी होता है। उसे धन के प्रवाह से मतलब है। वो धन काला है या सफेद, उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसे इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि कुछ लोगों के पास इफरात धन आ रहा है, जबकि ज्यादातर लोग बदहाल होते जा रहे हैं। इधर सरकार जहां कहीं भी गुंजाइश है, वहां से जमकर टैक्स वसूल रही है। साथ ही देश के नाम पर ऋण लेने में कोई कोताही नहीं बरत रही।औरऔर भी

अगर कृषि भारत की आर्थिक नीति के केंद्र में होती तो आज गांव, किसान व खेती की हालत इतनी खराब नहीं होती। सस्टेनेबल फार्मिंग और केमिकल-फ्री नेचुरल खेती के जुमलों के बीच किसान खेती छोड़कर भागने को मजबूर नहीं होते। दिक्कत यह है कि उन्हें भागकर कहीं जाने की कोई ठौर ही नहीं मिल रही। इस सरकार ने पिछले दस साल में कृषि को खैरातखाना बना दिया है। बजट में कृषि व किसान कल्याण विभाग को आवंटितऔरऔर भी