किसी व्यक्ति, कंपनी या संगठन की अहमियत तब मानी जाती है, जब उसके जाने से देश, दुनिया व समाज को बड़ा नुकसान हो और उसके अभाव को भर पाना मुश्किल हो। लेकिन क्या जी-20 के बारे में यही बात कही जा सकती है? जी-20 से अब जी-21 बन गया मंच आज खत्म हो जाए तो इससे दुनिया का कोई नुकसान नहीं होगा। एक फायदा ज़रूर होगा कि इसके आयोजन पर हर साल होनेवाली करोड़ों डॉलर की बर्बादीऔरऔर भी

जी-20 अफ्रीकी संघ को शामिल कर लिए जाने के बाद अब जी-21 हो गया है। लेकिन क्या वह विकसित देशों के समूह जी-7 के सामने विकासशील देशों या ग्लोबल साउथ की प्रखर आवाज़ बन पाया है? यह सच है कि यूक्रेन युद्ध के मसले पर दिल्ली समिट में चालाकी भरा बयान ड्राफ्ट करके ‘गइयो गाभिन, भैंसियो गाभिन’ के अंदाज़ में सर्वसम्मति हासिल कर ली गई। लेकिन राजनीति से आगे बढ़कर वैश्विक अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटने कीऔरऔर भी

शिखर सम्मेलन की समाप्ति के साथ भारत से जी-20 की रौनक उतरने लगी है। अब उसके नेतृत्व की सफलता के मूल्यांकन का दौर चल रहा है। हालांकि भारत की अध्यक्षता का कार्यकाल अभी 30 नवंबर तक चलेगा। बड़ी सफलता यह है कि सम्मेलन के पहले ही दिन संयुक्त दिल्ली घोषणा पर सर्वसम्मति बन गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बोला – मैं जी-20 देशों के नेताओं के डिक्लेरेशन को अपनाने का प्रस्ताव रखता हूं। फिर अगली ही सांसऔरऔर भी

इस साल मार्च से ही शेयर बाज़ार पर तेज़ी का सुरूर छाया हुआ है। छोटी-बड़ी सभी कंपनियों के शेयर चढ़े चले जा रहे हैं। सेंसेक्स 67,600 और निफ्टी 20,000 के करीब पहुंच कर नीचे उतरा है। अब भी तमाम सूचकांकों में शामिल 80-90% स्टॉक्स 52 हफ्ते के शिखर के आसपास डोल रहे हैं। ऐसे में निवेशकों को मौका चूक जाने का डर सताने लगा है, जिसे अंग्रेज़ी में Fear of Missing out या फोमो कहते हैं। इसऔरऔर भी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का उनका नारा विश्व कल्याण के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बन सकता है। लेकिन भारत की ज़मीनी हकीकत से वाकिफ कोई भी व्यक्ति सवाल उठा सकता है – किसका साथ, किसका विकास? पिछल नौ सालों में देश में आर्थिक व सामाजिक स्तर पर विषमता व वैमनस्य बढ़ता गया है। आबादी का निचला 50% राष्ट्रीय आय का मात्र 13% हासिल करता है। उसके पास देश की दौलत काऔरऔर भी