इधर कॉरपोरेट क्षेत्र पर ऋण का बोझ खूब घटा है। साथ ही बैंकों के एनपीए कम हो गए हैं क्योंकि उन्होंने पिछले छह सालों में 11.17 लाख करोड़ रुपए के ऋण बट्टेखाते में डाल दिए। मगर, दिक्कत यह कि इन्हीं छह सालों में पहले आर्थिक सुस्ती और फिर कोरोना की मार से किसानों से लेकर आम उपभोक्ता तक ज्यादा कर्जदार हो गया है। यकीनन, बड़े कॉरपोरेट घरानों और उनके आला कर्मचारियों के साथ ही सरकारी कर्मचारियों कीऔरऔर भी

भारत के सामने अब मुद्रास्फीति को थामना नहीं, बल्कि आर्थिक विकास दर को बढ़ाना बड़ी चुनौती है। रिटेल मुद्रास्फीति की दर नवंबर में 5.88% थी। यह दिसंबर में और घटकर 5.72% हो गई है। यह काफी सुखद संकेत है। लेकिन दुखद बात यह है कि देश में औद्योगिक निवेश नहीं बढ रहा। वह भी तब, जब मोदी सरकार जब देश के भौतिक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार बेहतर बनाने के साथ ही उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई)औरऔर भी

विषम और विकट स्थितियों में सामान्य नियम काम नहीं करते। मसलन, किसी देश का मुद्रा अगर अगर डॉलर व यूरो के मुकाबले कमज़ोर होती है तो माना जाता है कि उस देश का निर्यात बढ़ जाएगा क्योंकि उसका माल इन देशों में डॉलर में सस्ता हो जाएगा। इधर कुछ महीनों भारतीय रुपया डॉलर और यूरो दोनों के ही खिलाफ काफी कमज़ोर हुआ है। डॉलर पहले 75 रुपए का हुआ करता था, अब 82 रुपए का मिल रहाऔरऔर भी

कंपनी का अतीत देखा-परखा जा सकता है। तमाम टूल्स व फॉर्मूले भी हैं जिनसे उसका भविष्य आंका जा सकता है। यह काम कोई दूसरा आपके लिए कर सकता है। लेकिन तीन पहलू ऐसे हैं जिन्हें निवेश करने से पहले खुद आपको समझना पड़ता है। पहला यह कि कंपनी का बिजनेस मॉडल क्या है और उसमें विकास की कितनी गुंजाइश है? दूसरा यह कि उसका प्रबंधन कैसा है? प्रबंधन का काबिल होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि यह भीऔरऔर भी

रिजर्व बैंक का कहना है कि इस समय भारत जैसे उभरते बाजारों की संभावनाओं की तुलना में गहराते वैश्विक आर्थिक हालात का खतरा ज्यादा है। बढ़ती ब्याज दरों से अर्थव्यवस्था में सबसे लिए उधार लेना मंहगा हो गया है। इससे उपभोक्ता और निवेश, दोनों की ही मांग पर नकारात्मक असर पड़ा है। इससे आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड़ सकती हैं। अमेरिका में इसका साफ असर देखा जा रहा है। वहां के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने 2023 मेंऔरऔर भी