सितंबर तिमाही के जीडीपी आंकड़ों के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा था कि चालू वित्त वर्ष 2022-23 में अर्थव्यवस्था 6.8% से 7% बढ़ सकती है क्योंकि बढ़ती मांग से मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में उछाल आ सकता है। लेकिन जो क्षेत्र सितंबर तिमाही में 4.3% सिकुड़ा हो, उसमें अचानक कैसे उछाल आ सकता है? वह भी तब, जब रिजर्व बैंक बराबर ब्याज दर बढ़ाकर मांग घटाने में लगा है! दो दिन पहले बुधवार को हीऔरऔर भी

अपना शेयर बाज़ार रिकॉर्ड ऊंचाई के आसपास मंडरा रहा है। निफ्टी और सेंसेक्स कुलांचे मार रहे हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था या उसकी माप करनेवाले जीडीपी की क्या स्थिति है? चालू वित्त वर्ष 2022-23 में जुलाई से सितंबर तक की तिमाही में हमारा जीडीपी 6.3% बढ़ा है। इसमें भी कृषि क्षेत्र की विकास दर 4.6% रही है जिस पर बहुत सारे विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब खुद केंद्रीय कृषि मंत्रालय कि इस बार खरीफऔरऔर भी

किसी समय शेयर बाज़ार को अर्थवयवस्था का बैरोमीटर माना जाता था। लेकिन क्या आज ऐसा नहीं है। हमारा शेयर बाज़ार इस समय ऐतिहासिक ऊंचाई के इर्दगिर्द घूम रहा है। लेकिन अर्थव्यवस्था की हालत नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद जो बिगड़ी और कोरोना महामारी से जैसा उसे तहस-नहस किया गया, उसके बाद उमंग नहीं लौट पा रही। टैक्स संग्रह ज़रूर बढ़ रहा है। लेकिन सरकार के फालतू खर्च ज्यादा रफ्तार से बढ़ रहे हैं। इन खर्चों कोऔरऔर भी

देश की मुद्रा की विनिमय दर और उसकी अर्थव्यवस्था में क्या सम्बन्ध है? कोई भी सीधा रिश्ता नहीं। दशकों पहले पीपीपी (परचेज़िंग पावर पैरिटी) का पैमाना चलता था। तब मुद्रा का बाहरी मूल्य उसके आंतरिक मूल्य से तय होता था। अलग-अलग मुद्राओं से संबंधित देश के भीतर चल रही मुद्रास्फीति के अंतर से उसकी मुद्रा की विनियम दर तय होती थी। तब देश के निर्यात व आयात का अंतर या चालू खाता खास मायने रखता था। लेकिनऔरऔर भी

बड़ी सीधी साफ-सी बात है कि किसी देश की अर्थव्यवस्था हमेशा उसकी अपनी मुद्रा में चलती है। अमेरिका की डॉलर में, ब्रिटेन की पौंड में, यूरोप की यूरो में तो भारत की रुपए में। लेकिन टेढ़ी-सी बात यह है कि क्या आज की ग्लोबल दुनिया में देश की अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित शक्ति और उसकी मुद्रा की विनिमय दर में कोई सीधा रिश्ता है? फिर सवाल यह भी उठता है कि क्या आज के माहौल में शेयर बाज़ारऔरऔर भी