किसी कंपनी के शेयर में किया गया निवेश साल-दर-साल अगर बैंक एफडी या सरकारी बॉन्ड से ज्यादा रिटर्न दे रहा है तो मतलब कि आपने सही वक्त पर सही कंपनी पकड़ ली। लेकिन न तो हमेशा ऐसा होता है और न ही सही कंपनी चुनने का कोई अचूक सूत्र है। यकीनन, हमें हर कोण से देखने-परखने के बाद कंपनी चुननी चाहिए। लेकिन पोर्टफोलियो में कुछ कंपनियां शानदार रिटर्न देती हैं तो कुछ फिसड्डी और घाटे का सबबऔरऔर भी

शेयर डीमैट हो चुके हैं, अमूर्त हैं। उनके भाव धन, खासकर डॉलर के प्रवाह पर निर्भर हैं। इसलिए जानना होगा कि डॉलर के रूप में बह रहा धन किस पर निर्भर है। साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से ही डॉलर ने अपने यहां गदर काट रखी है। अभी तो अपना रिजर्व बैंक ब्याज दर बढ़ाए, इससे कहीं ज्यादा असर शेयर बाज़ार में अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के ब्याज दरें बढ़ाने से होता है। अपनेऔरऔर भी

व्यापारी वस्तुओं में ट्रेड करता है। माल खरीदता और बेचता है। लेकिन शेयर बाज़ार का ट्रेडर ऐसे किसी माल या वस्तु में नहीं, बल्कि लिस्टेड कंपनियों के स्टॉक्स को ट्रेड करता है जो पूरी तरह डीमैट हो चुके हैं जिन्हें महसूस किया जा सकता है, हाथ में पकड़कर दिया या लिया नहीं जा सकता। वह कंपनियों के स्वामित्व के अंश में ट्रेड करता है, जिसका भाव हर पल परसेप्शन के आधार पर बदलता रहता है। लेकिन आजकलऔरऔर भी

व्यापारी कभी मगजमारी नहीं करता कि किसी चीज के दाम क्यों बढ़े या घट गए। उसे तो अपने मार्जिन से मतलब है। बाज़ार में है तो इतना जागरूक जरूर रहता है कि दाम घट-बढ़ क्यों रहे हैं। लेकिन इससे ज्यादा नहीं। दाम बढ़े तो उसका असर उत्पादक और ग्राहक पर पड़ेगा। व्यापारी को तो एक निश्चित प्रतिशत ही कमीशन या मार्जिन मिलेगा। शेयर बाजार के ट्रेडर को भी अपने पेशे की इस हकीकत को जज़्ब कर लेनाऔरऔर भी