अब रिटेल की हालत हो रही डांवाडोल!
अभी तक शेयर बाजार को रिटेल निवेशकों ने संभाल रखा था। लेकिन क्या रिटेल निवेशकों व ट्रेडरों का यह सहयोग आगे भी बना रहेगा? हुआ यह था कि साल 2020 के दूसरे हिस्से और पूरे साल 2021 में शुरुआती गिरावट के बाद लोगों की आय कुछ ज्यादा ही तेज़ी से बढ़ गई। ब्याज दरें भी कम थीं तो इससे उपभोक्ता खपत बढ़ गई। कम ब्याज दर की वजह से वाहनों, मकान और बिजनेस तक के लोन परऔरऔर भी
विदेशियों के निकलने से कपनियां पस्त!
भारतीय शेयर बाज़ार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की होल्डिंग में एक तिमाही में 6% घट गई है। यह सच वित्तीय सेवाओं की प्रमुख वैश्विक फर्म मॉर्निंगस्टार की एक रिपोर्ट में सामने आया है। दिसंबर 2021 की तिमाही में हमारी लिस्टेड कंपनियों में एफपीआई की शेयरधारिता 654 अरब डॉलर हुआ करती थी। यह मार्च 2022 की तिमाही में घटकर 612 अरब डॉलर रह गई। हालांकि यह साल भर पहले मार्च 2021 की तिमाही के 552 अरब डॉलरऔरऔर भी
रिटेल न बचाते, 2008 जैसा होता हाल!
गंजेड़ी यार किसके, दम लगाके खिसके। यही हाल अपने यहां विदेशी संस्थागत निवेशकों या एफआईआई का है। वे बीते वित्त वर्ष में भारतीय शेयर बाज़ार से करीब 3 लाख करोड़ रुपए की मुनाफावसूली कर चुके हैं और अब भी बेचे जा रहे हैं। बता दें कि साल 2008 के क्रैश के आसपास एफआईआई ने लगभग इतनी ही रकम निकाली थी और अपना बाज़ार 60% से ज्यादा गिर गया था। इस बार तो निफ्टी-50 अपने शीर्ष से अभीऔरऔर भी
समझ से कमाओ तो एक्सपर्ट से गंवाओ
निवेश करते वक्त अपना स्वतंत्र विवेक विकसित करना बहुत ज़रूरी है। अन्यथा, शेयर बाज़ार ही नहीं, हमारा समूचा वित्तीय बाज़ार ऐसे शिकारियों भरा पड़ा है जो कभी भी हमें निपटा सकते हैं। यहां का कोई भी एक्सपर्ट भरोसा करने लायक नहीं है। आपको याद होगा कि जब मार्च-अप्रैल 2020 के दौरान कोरोना की पहली लहर में शेयर बाज़ार ऐतिहासिक तलहटी पकड़ चुका था, तब तथाकथित बाज़ार ‘विशेषज्ञ’ कह रहे थे कि अभी तो कयामत आनी बाकी हैऔरऔर भी







