लालच व भय की भावनाएं बहें कहां से!
शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में भाव लालच और भय की भावनाओं से तय होते हैं। लेकिन लालच और भय की इन भावनाओं को कहां से हवा व गति मिलती है? फिर चुनावों का संदर्भ लेते हैं। उत्तर प्रदेश में धारणा बनाई जा रही है कि समाजवादी पार्टी आ गई तो गुड़ों का राज होगा, सभी असुरक्षित, एक ही परिवार का डंका बजेगा। सामने से कहा जा रहा है कि भाजपा झूठ ही झूठ बोलती है, किसान विरोधीऔरऔर भी
मौसम चुनाव का, खेल वोटिंग मशीन का
चुनावों का मौसम है। बढ़-चढ़कर दावे किए जा रहे हैं। पक्ष-विपक्ष दोनों नहीं जीत सकते। लेकिन दोनों का दावा कि सामनेवाले का सूपड़ा साफ हो जाएगा। अवाम की भावनाओं को हवा दी जा रही है। शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग भी इसी तरह भावनाओं का खेल है। निवेश के सबसे बड़े गुरु बेंजामिन ग्राहम का मशहूर कथन है कि शेयर बाज़ार छोटे समय में वोटिंग मशीन की तरह काम करता है और लम्बे समय में तराजू का। उनकेऔरऔर भी
न क्रिप्टो, न ट्रेडिंग, केवल लम्बा निवेश!
एक बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि न तो अपने यहां देखभाल करनेवाला समाज है और न ही सरकार। हर कोई स्वार्थ का पुतला है। सरकार भी चंद निहित स्वार्थों की सेवा में लगी है। सबका साथ, सबका विकास महज अवाम को झांसा देने का नारा है। सबका विश्वास भी चरका पढ़ाकर हासिल किया जाता है। हमें अपना हित खुद समझना और हासिल करना है। शेयर बाज़ार पर भी यह बात पूरी तरह लागू होतीऔरऔर भी
कमाना होगा ट्रेडिंग में नौकरी से ज्यादा!
हिसाब बड़ा साफ है। अगर आप नौकरी से महीने में एक लाख रुपए की सैलरी हासिल कर रहे हैं तो शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग या किसी अन्य बिजनेस से एक लाख कमाते हैं तब असल में माना जाएगा कि आपके उद्यम का तुलनात्मक ‘आर्थिक मूल्य’ शून्य हुआ, यानी आप पहले जैसी ही स्थिति में बने हुए हैं। अगर ट्रेडिंग से आप महीने में 40-50 हज़ार रुपए कमा लेते हैं (जो बुरी कमाई नहीं है), तब आप प्रतिमाहऔरऔर भी







