कंपनी कितनी भी अच्छी हो, बिजनेस मॉडल कितना भी जानदार हो, लेकिन उसके शेयर को किसी भी भाव पर खरीद लेना सही नहीं होता। मसलन, जुबिलैंट फूडवर्क्स का धंधा जमा-जमाया है। एवेन्यू सुपरमार्ट्स (डी-मार्ट) का भी बिजनेस मॉडल जबरदस्त है। लेकिन जब निफ्टी 24.75 और सेंसेक्स 28.48 के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा है, तब जुबिलैंट फूडवर्क्स का शेयर 118.40 और डी-मार्ट का शेयर 223.04 के पी/ई अनुपात पर खरीदना नादानी ही नहीं, पागलपन है। शेयरऔरऔर भी

दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं मुद्राओं के जरिए आपस में जुड़ी रहती हैं और उनका संतुलन बनता-बिगड़ता रहता है। बीते 21 साल में विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का हिस्सा लभभग 12% घट गया है। यूरो का हिस्सा भी 28% से घटकर 20% पर आ गया है। फिर बाकी हिस्सा किसके पास है। दुनिया के वित्तीय बाज़ार का लगभग 5% ब्रिटिश पाउंड, 5% जापानी येन और मात्र 2.6% चीनी युआन के पास है। साफ है कि दुनिया की दूसरीऔरऔर भी

नए साल में एफपीआई की खरीद बढ़ने के साथ ही शेयर बाज़ार में तेज़ी का सुरूर चढ़ने लगा। उधर अमेरिका का सिस्टम में नोट छापकर डॉलर डालने और मुद्रास्फीति को थामने के लिए उसे वापस खींचने का क्रम जारी है। इस तरह वह अपनी अर्थव्यवस्था को गरम-ठंडा करता रहता है। लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था उसकी इस हरकत से प्रभावित होती है। वैसे, दुनिया के वित्तीय बाज़ार में अमेरिकी डॉलर का हिस्सा लगातार घटता जा रहा है। साल 2000औरऔर भी

अमेरिका में नोट छापकर सिस्टम में डालने और ज़रूरत प़ड़ने पर से वापस खींच लेने का सिलसिला 9 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेडर सेंटर पर लादेन के आतंकी हमले के बाद से ही चल रहा है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद यह ज्यादा तेज़ हो गया। तब तो यूरोप से लेकर जापान तक नोट छापकर सिस्टम में डालने लगे थे। करीब चार साल बाद बॉन्ड खरीदकर सिस्टम में नोट डालने का क्रम धीमा हुआ। लेकिनऔरऔर भी

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन ने कुछ दिन पहले ही सिस्टम में 200 अरब युआन या रेन्मिन्बी डाले हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाज़ार में इसका कोई असर नहीं पड़ता। वहीं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व अगर सिस्टम में डॉलर डालता या निकालता है तो उसका बहुत बड़ा असर पड़ता है। डॉलर की उपलब्धता घटाने के लिए वह बॉन्ड की खरीद घटा सकता है। इसका सीधा-सा मतलब होगा, कोविड के प्रकोप के बाद अर्थव्यवस्था को दिए जा रहेऔरऔर भी