शेयर बाज़ार के निवेश और ट्रेडिंग दोनों में रिस्क है। होना यह चाहिए कि इसमें उतरनेवाले हर शख्स को अपनी रिस्क क्षमता का सही आकलन करने के बाद निवेश या ट्रेडिंग का तरीका चुनना चाहिए। लेकिन इसको लेकर नज़रिया भी अलग-अलग है। मसलन, आम धारणा है कि दो-चार साल या ज्यादा समय के लम्बे निवेश में सबसे कम रिस्क है, जबकि इंट्रा-डे ट्रेडिंग में सबसे ज्यादा। लेकिन इंट्रा-डे ट्रेडर कहते हैं कि वे तो अपना रिस्क उसीऔरऔर भी

मुद्रास्फीति बढ़ने के संकेत। बॉन्ड की यील्ड बढ़ी तो ब्याज दर बढ़ने का पूरा अंदेशा। नतीजतन, सिस्टम में पूंजी या धन की लागत बढ़ने की आहट। इसका अंदाज़ लगता है कॉल मनी की बढ़ती दरों से, जिन पर बैंक एक दूसरे को चंद घंटों के लिए उधार देते हैं। फिर, पूंजी की लागत किसी एक उद्योग-धंधे के लिए नहीं बढ़ती। सारा बिजनेस समुदाय और व्यापारिक गतिविधियां इसके लपेटे में आ जाती हैं। वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग भीऔरऔर भी

सभी वित्तीय बाज़ार आपस में जुड़े हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। इसलिए शेयर बाज़ार का ट्रेडर खुद को शेयर बाज़ार तक सीमित रखे तो शेयरों की गति का सबब नहीं जान सकता। मसलन, इस समय बॉन्ड के भाव घट रहे है तो उन पर यील्ड बढ़े जा रही है। नतीजतन, ब्याज दर बढ़ सकती है तो धन का प्रवाह घटने के भय से शेयर बाज़ार दबाव में है। कल तुर्की की मुद्रा लीरा केंद्रीय बैंकऔरऔर भी

अपने यहां मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, कोलकाता व बेंगलुरु जैसे महानगरों ही नहीं, जयपुर, लुधियाना, कानपुर व मेरठ जैसे शहरों के साथ-साथ देश के कस्बों और गांवों तक में बेरोजगार व कम कमानेवाले लोगों को शेयर बाज़ार का चस्का लगा हुआ है। लेकिन उन्हें नहीं पता कि वित्तीय बाज़ार की दुनिया में शेयर बाज़ार सबसे छोटा है। विदेशी मुद्रा या करेंसी बाज़ार सबसे बड़ा है। वो शेयर बाज़ार से 100-200 गुना है, जबकि बॉन्ड बाज़ार 50-70 गुना औरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेश में पक्का कुछ नहीं होता, केवल प्रायिकता होती है। यहां जो पक्के रिटर्न की बात करते हैं, वे आपको उल्लू बनाते हैं। पक्का तो सरकारी बांड या एफडी पर मिलनेवाला ब्याज होता है। शेयर बाज़ार का कोई भरोसा नहीं कि कहां तक उठेगा या गिरेगा। इसलिए निवेश में ‘पक्का’ और ‘प्रायिकता’ के बीच हमेशा संतुलन बनाकर चलें। 100 रुपए हैं तो पहले 25 बांड या एफडी में और 25 शेयर बाज़ार में। बाकीऔरऔर भी