दो साल से जारी कोरोना संकट का सबक सरकारों से लेकर समाज, अर्थव्यवस्था और अवाम के लिए यकीनन अलग-अलग हो सकता है। लेकिन हर खास-ओ-आम के लिए सोचने-समझने की बात है कि ऐसा क्या है जिसने सारा चक्का जाम कर दिया। पूंजी का बहना जारी है। लग रही है, निकल रही है। शेयर बाज़ार झमाझम। बिक्री और रोजमर्रा की खपत जारी है। मशीनें सलामत हैं, फैक्ट्रियां बरकरार है। रुका है तो जन और श्रम का प्रवाह। श्रमिकऔरऔर भी

देश में सालोंसाल से स्वास्थ्य पर केंद्र सरकार का खर्च 1.15% जीडीपी पर अटका है, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने कई साल पहले इसे 2.5% करने का वादा किया था। राज्यों का भी खर्च मिला दें तो स्वास्थ्य सेवा पर हमारा कुल सरकारी खर्च जीडीपी का 3.6% बनता है, जबकि चीन इन सेवाओं पर जीडीपी का 5%, ब्राज़ील 9.2%, जापान 10.9% और जर्मनी 11.2% खर्च करता है। वहीं, विश्व का औसत 6.1% जीडीपी का है। कोरोना काल तकऔरऔर भी

ठीक तीन महीने पहले इसी साल 28 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के वीडियो संबोधन में अपनी वाहवाही करते हुए कहा था कि दुनिया के विशेषज्ञों व संस्थाओं ने भविष्यवाणी की थी कि “भारत में कोरोना की सुनामी आएगी। लेकिन भारत प्रो-एक्टिव पब्लिक पार्टिसिपेशन के एप्रोच के साथ आगे बढ़ता रहा। हमने कोरोना के खिलाफ लड़ाई जनांदोलन में बदल दी। आज भारत दुनिया के उन देशों में से है जो अपने ज्यादा से ज्यादाऔरऔर भी

भारत की स्थिति किसी गरीब अफ्रीकी मुल्क जैसी हो गई है। कोरोना के मरीज पांच दिन से लगातार नया रिकॉर्ड बना रहे हैं। ब्रिटेन, जर्मनी व अमेरिका से लेकर यूनिसेफ जैसी संस्थाएं भारत को मेडिकल मदद देने को उत्सुक हैं। आखिर, इस साल के बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वास्थ्य आवंटन 137% बढ़ाकर 2,23,846 करोड़ रुपए कर दिया तो स्वास्थ्य सेवाओं व अस्पतालों की स्थिति इतनी बदतर व दयनीय क्यों? दरअसल, वित्त मंत्री ने झूठऔरऔर भी

शेयर बाज़ार देश में कोरोना की दूसरी लहर को न जाने कब जज्ब करना शुरू करेगा! लेकिन रेटिंग एजेंसियों ने भारत की अर्थव्यवस्था पर इसके ऋणात्मक असर का आकलन शुरू कर दिया है। इंडिया रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष 2021-22 में हमारे जीडीपी की वास्तविक विकास दर का अनुमान 10.4% से घटाकर अब 10.1% कर दिया है। अभी तक के हिसाब-किताब के मुताबिक बीते वित्त वर्ष 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ने के बजाय 7.6% घटी है। इसलिएऔरऔर भी