शेयर बाज़ार में खरीदनेवाले कौन हैं, इससे भी बहुत फर्क पड़ता है। रिटेल की खरीद समुंदर में एक लोटा या बाल्टी पानी के बराबर होती है। सौ सुनार की, एक लोहार की। बाज़ार में बल्क/ब्लॉक खरीद तो जगजाहिर हो जाती है और वह खटाक से एक-दो दिन में निपट जाती है। लेकिन इनसे अलग प्रोफेशनल व सस्थागत निवेशकों की खरीद होती है जो खास दिशा पकड़कर बराबर चलती है। इसकी परख ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

यूं तो हर दिन बाज़ार में खरीदे और बेचे गए शेयरों की संख्या बराबर होती है। लेकिन खरीदने और बेचनवालों की संख्या भिन्न हो सकती है। इसमें भी अगर खरीदने का जोर ज्यादा तो शेयर के भाव बढ़ते हैं और बेचने का ज़ोर ज्यादा तो शेयर गिरते हैं। खरीदनेवालों की ज़मात किस दिन, किस ओर मुड़ जाए, पहले से इसका कोई पता नहीं रहता। वे ज्यादा मुनाफे के मौके सूंघते फिरते रहते हैं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में धोखे व फ्रॉड का खेल चलता रहता है। इसका गुब्बारा फुलाने के पीछे किसी न किसी ताकतवर खिलाड़ी/संस्था का हाथ रहता है। ऐसे कई किस्से वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट तक बिखरे पड़े हैं। इसलिए हमारे लिए सबसे अच्छी रणनीति यह है कि बाज़ार के उन्माद का शिकार होने के बजाय शांत भाव से अच्छा धंधा कर रही संभावनामय कंपनियों में 5-10 साल के लिए निवेश करे। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

निवेशकों की नई लहर आती रहती है। इस वक्त नौकरीपेशा लोग, खासकर आईटी क्षेत्र के बंदे वर्क-टू-होम के दौरान बड़ी तेज़ी से शेयर बाज़ार की तरफ उमड़े हैं। लेकिन हो सकता है कि अक्टूबर-नवंबर में कोरोना का दूसरा झटका लगने के बाद ये सभी गायब हो जाएं। पिछले घोटालों ने निवेशकों की लहरें सोख लीं। अब बाज़ार का कड़वा सच ताज़ा लहर को ले डूबेगा। बचे रह जाएंगे वही ढाक के तीन पात। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी