ऑप्शन ट्रेडिंग करते वक्त आपको चार बातों का फैसला करना होता है। पहला यह कि आपके लिए निफ्टी या बैंक निफ्टी के ऑप्शंस में ही ट्रेड करना ज्यादा मुनासिब व आसान होगा। दूसरा यह कि आपको किस स्ट्राइक मूल्य का ऑप्शन लेना है। तीसरा यह कि आपको क़ॉल ऑप्शन खरीदना है या पुट ऑप्शन। और, चौथा यह कि आपको कब ऑप्शन खरीदना है, नए सेटलमेंट की शुरुआत में, बीच में या एक्सपायरी के पहले वाले हफ्ते में।औरऔर भी

बाहरी कृपा से कभी किसी का कल्याण नहीं होता। हमें अपना कल्याण खुद अपनी मेहनत, काम और दूसरों के सहयोग से करना होता है। दूसरा केवल राह दिखा सकता है। चलने का अभ्यास हमें खुद करना पड़ता है। यह बात आम जीवन के साथ ही ऑप्शन ट्रेडिंग के गुर सीखने पर भी लागू होती है। इसके अलावा यह गुर सीखने की एक और बुनियादी शर्त है कि जोड़-घटाने, हिसाब-किताब में आपकी रुचि होनी चाहिए। अगर सामान्य गणितऔरऔर भी

अगर हमने ऑप्शन के भाव निकालने का तरीका नहीं समझा तो हम 100 में से 88 बार हारते ही रहेंगे और अपना प्रीमियम गंवाते ही रहेंगे। दिक्कत यह है कि अगली बार जीत जाएंगे, इस भ्रम और भरोसे में रिटेल ट्रेडर हमेशा इंडेक्स ऑप्शन खरीदने में जुटे रहते हैं। अगर लगा कि बाज़ार बढ़ सकता है तो निफ्टी या बैंक निफ्टी का कॉल ऑप्शन खरीद लिया और गिरने की धारणा हो तो इनका पुट ऑप्शन खरीद लिया।औरऔर भी

अमेरिका में बेरोजगारी 1929 की महामंदी के बाद सबसे बदतर अवस्था में है। चीन पहले से त्रस्त है। भारत की विकास दर का अनुमान मूडीज़ ने शून्य कर दिया है। कुछ अर्थशास्त्री तो इसके ऋणात्मक होने की गणना कर रहे हैं। शेयर बाज़ार से निवेशक दूर भाग रहे हैं। अप्रैल में इक्विटी म्यूचुअल फंड स्कीमों में निवेश 47% घट गया है। ऐसे में भागना उचित है या डटे रहना। तथास्तु में इसका जवाब एक कंपनी के साथ…औरऔर भी

ऑप्शन कॉन्ट्रैक्ट का भाव तो बाजार निर्धारित करता है। लेकिन व्यवहार में देखें तो भाव बेचनेवाले तय करते हैं, खरीदनेवाले नहीं। फिर भी रिटेल ट्रेडर के पास यह सुविधा होती है कि वह अपने अध्ययन व समझ से यह परख सकें कि बाज़ार में चल रहा ऑप्शन का भाव सही है या नहीं। अगर उसके भाव बढ़ाकर रखे गए हैं तो वह बिना लालच में फंसे उससे दूर रह सकता है और किसी वजह से वाजिब याऔरऔर भी