अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव वित्तीय बाज़ारों पर जादुई असर डालते हैं। पांच महीने बाद 3 नवंबर को इस बार के चुनाव होने हैं। आमतौर पर इसके नजदीक आते ही शेयर बाज़ार बढ़ने लगता है, ब्याज दरें घट जाती हैं, मुद्रास्फीति में कमी आ जाती है। यहां तक के अमेरिका में बेरोजगारी की दर घटने लगती है। लेकिन इस बार कोरोना ने सारा समीकरण गड़बड़ा दिया है तो देखते हैं वास्तव में क्या होगा। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

हमेशा-हमेशा के लिए गांठ बांध लें कि शेयर बाज़ार में कुछ भी अकारण नहीं होता और यह भी कि आज हमारा शेयर बाज़ार पूरी तरह लोकल से ग्लोबल हो चुका है। साथ ही नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका का वित्तीय बाज़ार दुनिया में सबसे बड़ा है। वहां कुछ भी होता है तो उसका असर सारी दुनिया के बाज़ारों पर पड़ता है। ठीक वैसा ही असर पड़े, ज़रूरी नहीं। लेकिन असर पड़ता ज़रूर है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

कोरोना ने 24 मार्च को शेयर बाज़ार को जिस कदर धूल चटाई थी, बाज़ार वहां से सारी धूल झाड़कर उठ खड़ा हुआ है। तब के न्यूनतम स्तर से निफ्टी-50 मात्र तीन महीने में 38.24% और निफ्टी-500 सूचकांक 39.13% बढ़ चुका है। इन 500 कंपनियों में से कुछ कंपनियों के शेयरों के भाव तो इस दौरान दोगुने हो गए हैं। कोरोना का संकट गया नहीं है, फिर भी बाज़ार में यह उन्माद! आज तथास्तु में एक नई कंपनी…औरऔर भी

जर्मन मूल की ग्लोबल ई-पेमेंट कंपनी वायरकार्ड ने बैंकिंग और इसके नजदीकी धंधों में अपने हाथ-पैर पूरी दुनिया में फैला रखे थे। फिर भी उसका कद ऐसा नहीं है कि इसी 25 जून को उसके दिवाला बोल देने से दुनिया के वित्तीय ढांचे पर 2008 जैसा खतरा मंडराने लगे। अलबत्ता, जिस तरह इस मामले में एक बड़ी ग्लोबल एकाउंटेंसी फर्म अर्न्स्ट एंड यंग की सांठ-गांठ सामने आई है, उसे देखते हुए तमाम छोटे-बड़े निवेशकों में डर समाऔरऔर भी

चौंकना अच्छी बात है क्योंकि यह हमारी जिज्ञासा को धार देता है। लेकिन जब हम क्रिया या कार्य के पीछे के कारणों को जानने लगते हैं, तब उतना नहीं चौंकते। वित्तीय बाज़ार का भी यही हाल है। बाकी दुनिया की तरह यहां भी कुछ अकारण नहीं होता। कारण नहीं जानते तो हम ऐसा क्यों, वैसा कैसे सोच-सोचकर उछलते रहते हैं। कारण जान जाते हैं तो शांति से ट्रेडिंग या निवेश करने लगते हैं। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी