ट्रेडिंग में नज़र साफ करने के झंझट कम नहीं। एनएसई की वेबसाइट से डेरिवेटिव्स की भाव कॉपी डाउनलोड करो। फिर उसमें से केवल फ्यूचर्स का डेटा निकालो। फिर हर स्टॉक में इस महीने, अगले महीने और दूर के महीने के ओपन इंटरेस्ट पर नज़र डालो। उनकी घट-बढ़ को स्टॉक के भाव के साथ जोड़कर देखो। फिर उनमें से 2-4 स्टॉक चुनकर निकालो। इतनी मशक्कत के बाद उनके भावों को अनेक इंडीकेटर पर परखो। अब शुक्र का अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडिंग के स्टॉक्स को चुनने के बाद मसला यह है कि किनमें बढ़ने की प्रायिकता ज्यादा है और किनमें गिरने की? कुछ विशेषज्ञ इसके लिए डेरिवेटिव सेगमेंट में ओपन इंटरेस्ट का सहारा लेते हैं। अगर डेरिवेटिव सेगमेंट में स्टॉक का ओपन इंटरेस्ट बढ़ने के साथ कैश सेगमेंट में भाव भी बढ़ रहा हो तो उसमें खरीदने और जिनमें ओपन इंटरेस्ट बढ़ने के साथ भाव घट रहा हो, उनमें शॉर्ट करने को कहते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

डेरिवेटिव सेगमेंट के स्टॉक्स में ट्रेडिंग करने का दोहरा फायदा यह है कि अगर किसी में गिरावट के संकेत मिल रहे हों तो उसमें आप शॉर्ट सेलिंग भी कर सकते हो। हालांकि स्टॉक्स में शॉर्ट सेलिंग काफी रिस्की है। इसलिए रिटेल ट्रेडरों को उससे दूर रहना चाहिए। खरीदने लायक सौदे दिखें तो ट्रेड करना चाहिए। अन्यथा, हर दिन ट्रेडिंग करना ज़रूरी नहीं। ट्रेडिंग न करना और कैश रखना अपने-आप में एक पोजिशन है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

ट्रेडिंग के लिए शेयरों के भावों को कम से कम तीन टाइमफ्रेम में देखना पड़ता है। तभी वह सही दिन सही स्टॉक का चुनाव और उसमें एंट्री, एक्जिट और स्टॉप-लॉस का निर्धारण कर सकता है। इस तरह उसे रोज़ाना 80 स्टॉक्स के 240 चार्ट देखने पड़ेंगे। उसके बाद भी उसे प्रायिकता से दो-दो हाथ करना पड़ता है क्योंकि पीछे की सारी नाप-जोख और गिनती के बावजूद कोई गारंटी नहीं कि ट्रेड सही बैठेगा। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

निफ्टी-500 सूचकांक के 500 स्टॉक्स के बाद डेरिवेटिव सेगमेंट के 141 स्टॉक्स। उसमें भी रोज़ना औसतन 3000 कॉन्ट्रैक्ट वाले स्टॉक्स। इस तरह सूची छोटी होकर 70-80 स्टॉक्स तक पहुंच जाएगी। समझ लें कि ट्रेडिंग के काम को स्टॉक्स की यह सबसे बड़ी सूची है। आप डे-ट्रेडर, स्विंग अथवा मोमेंटंम ट्रेडर हों, इससे ज्यादा स्टॉक्स के चक्कर में पड़े तो चकरघिन्नी बन सकते हैं। स्टॉक की चाल तीन टाइमफ्रेम में तो देखनी ही पड़ेगी। अब सोम का व्योम…औरऔर भी