बाज़ार धीरे-धीरे स्थिर हो रहा है। लेकिन अब भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। शॉर्ट करनेवाले अपनी पोजिशन कवर कर रहे हैं तो वह थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ रहा है। इस मायने में कहां जाए तो शॉर्ट से कमानेवाले या मंदडिए शेयर बाज़ार को एक हद तक गिरने पर उठाने लगते हैं। वैसे, अभी तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने साफ नजरिया नहीं बनाया है। वे किसी दिन खरीदते तो किसी दिन बेचते हैं। अब बुधवार की बुद्धि…और भीऔर भी

जहां हर पल लाखों लोगों की भावनाओं का ज्वार चलता हो, वहां तर्क का बह जाना निश्चित है। इसीलिए शेयर बाज़ार में बड़ी-बड़ी गणनाएं अक्सर फेल हो जाया करती हैं। फिर भी एक मोटा-सा नियम हमेशा काम करता है। अगर किसी भी वजह से ज्यादा धन किसी स्टॉक का पीछा करेगा तो लिवाली से उसका बढ़ना तय है। उसके बाद उसमें बिकवाली भी चलेगी। कुशल ट्रेडर लिवाली व बिकवाली के बीच कमाते हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…और भीऔर भी

इस बार का बजट न तो सरकार के घाटा प्रबंधन और न ही कृषि या उद्योग के लिए अच्छा रहा है। जबरन सच्चाई से आंखें चुराई गई हैं। फिर भी हमारा शेयर बाज़ार शुरुआती झटका खाने के बाद पहले जैसा कुलांचे मारने लगा है। विदेशी संस्थाओं ने कुछ दिन बेचा, मगर फिर वे भी खरीदारी पर उतर आए। सोचने की बात है कि आखिर बाज़ार की इस कुतर्की चाल की वजह क्या है? अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

बजट ने अर्थव्यवस्था को भले ही निराश किया हो, लेकिन शेयर बाज़ार थोड़ा-सा झटका खाने के बाद दोबारा बजट-पूर्व स्थिति में आ गया। सेंसेक्स अब भी 24.49 के पी/ई पर ट्रे़ड हो रहा है, जबकि उसका दीर्घकालिक औसत पी/ई अनुपात 18-19 गुने का है। जाहिर है कि निवेश की माकूल रेंज में आने के लिए बाज़ार को 25% से ज्यादा गिरना होगा। क्या यह संभव है? न भी संभव हो तो पेश हैं निवेश लायक दो कंपनियां…और भीऔर भी

जब बजट के एक दिन पहले आई आर्थिक समीक्षा में सितंबर 2014 में ज़ोर-शोर से शुरू की गई ‘मेक इन इंडिया’ योजना में संशोधन कर ‘असेम्बल इन इंडिया’ जोड़ दिया गया, तभी सकेत मिल गया था कि सरकार का मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने का इरादा अब ढीला पड़ गया है। सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ योजना शुरू करते वक्त लक्ष्य रखा था कि देश के जीडीपी में इसका योगदान 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 2022 तक 25औरऔर भी