हर निवेशक/ट्रेडर के दो सबसे बड़े दुश्मन हैं उसका अपना अतिविश्वास और भीड़ की मानसिकता। हम ताल ठोंककर मानते हैं कि जितना जान सकते हैं, उससे भी ज्यादा जानते हैं। भीड़ की मानसिकता यह है कि ज्यादातर लोग ऐसा कर रहे हैं तो हमें भी वैसा करना चाहिए। हर किसी में ये दोनों प्रवृत्तियां किसी न किसी मात्रा में होती हैं। लेकिन ये दोनों ही हमारी मेहनत से जुटाई पूंजी को खा जाती हैं। समझिए, बचिए, बढ़िए…औरऔर भी

शेयरों के भाव और कंपनी नतीजों में क्या आज और अभी का सीधा संबंध है? अगर होता तो कल पंद्रह तिमाहियों के बाद पहली बार शुद्ध लाभ में बढ़ोतरी, वो भी शानदार 115% की, हासिल करने के बावजूद भारती एयरटेल का शेयर 1.52% गिर नहीं गया होता! यहीं काम करती हैं उम्मीदें। एयरटेल इसलिए गिरा क्योंकि उससे ज्यादा शुद्ध लाभ की उम्मीद थी और जनवरी में दिसंबर तक की उम्मीद हवाई नहीं होती। अब गुरु का चक्र…औरऔर भी

इस समय दुनिया भर में हाई फ्रीक्वेंसी और अल्गोरिदम ट्रेडिंग पर बहस छिड़ी हुई है। इस हफ्ते सोमवार और मंगलवार को हमारी पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी ने भी इस पर दो दिन का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किया। इससे एक खास बात यह सामने आई कि सेकंड के हज़ारवें हिस्से में ट्रेड करनेवाले ऐसे महारथी भी पहले छोटे सौदों से बाज़ार का मूड भांपते हैं और पक्का हो जाने पर बड़े सौदे करते हैं। अब वार बुधवार का…औरऔर भी

हमने कल बाज़ार खुलने से करीब 45 मिनट पहले ही लिख दिया था कि आज भारी गिरावट का अंदेशा है। इसलिए ज़रा संभलकर। पर निफ्टी 2.09% गिरकर 6135.85 पर पहुंच जाएगा, इतनी उम्मीद नहीं थी। असल में यह बाहरी हवाओं का कोप है। पिछले हफ्ते मात्र दो दिनों में डाउ जोन्स करीब 500 अंक गिरा है। कोई इसका दोष चीन को दे रहा है तो कोई अमेरिका में बांड-खरीद घटाने को। सो, सावधानी से बढ़ते हैं आगे…औरऔर भी

शेयर/कमोडिटी बाज़ार में जो भी ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं, उन्हें यह सच अपने जेहन में बैठा लेना चाहिए कि यहां भावी अनिश्चितता को मिटाना कतई संभव नहीं। यहां सांख्यिकी या गणित की भाषा में प्रायिकता और आम बोलचाल की भाषा में संभावना या गुंजाइश चलती है। जो भी यहां भाव के पक्का बढ़ने/घटने की बात करता है वह या तो अहंकारी मूर्ख है या तगड़ा धंधेबाज़। इस सच को समझते हुए करते हैं हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी