यकीन मानिए, तथास्तु शेयर बाज़ार में लंबे निवेश की सबसे विश्वसनीय और अपने तरह की इकलौती सेवा है। कीमत मात्र 200 रुपए/महीने। इतना भी इसलिए ताकि हम अपना काम जारी रख सकें। एक पुरानी बानगी। अजंता फार्मा में 1 अगस्त 2011 को जब हमने निवेश की सलाह दी थी तब उसका दस रुपए का शेयर 347.10 पर था। अभी पांच रुपए का शेयर 987.15 पर है। दो साल में 5.68 गुना! यह कमाल है बस एक मिसाल…औरऔर भी

पिछले कुछ महीनों से शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग के बारे में गंभीरता से पढ़ रहा हूं तो लग रहा है कि यहां कितने चौकन्नेपन और फुर्ती की मांग है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। हमारी सोच, भावना और बर्ताव में ऐसी चीजें घुसी हुई हैं, जो हमारी ही दुश्मन हैं। सोच की लगाम हमारे अवचेतन के हाथ में है जिसे हम जानकर नहीं, मानकर चलते हैं। इसे जानकरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार 99% मौकों पर 99% लोगों को चरका पढ़ाता है। इसलिए बाकी 1% लोगों में शामिल होना और 1% सीमित मौकों को पकड़ना बेहद कठिन है। जीवन में आशावाद आगे बढ़ने का संबल बनता है, वहीं शेयर बाज़ार में निराशावाद कामयाबी की बुनियाद बनता है। हर सौदे के पहले सोचना चाहिए कि इसमें कितना घाटा संभव है, जबकि हम यही सोचते हैं कि इससे कितना फायदा कमा सकते हैं। अब करें सोच को पलटने का अभ्यास…औरऔर भी

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) की शुरुआत जब 3 जुलाई 1990 को हुई, तब निफ्टी 279 पर था। 23 साल बाद तमाम उतार-चढ़ावों के बाद बावजूद 3 जुलाई 2013 को निफ्टी 5771 पर बंद हुआ। सालाना चक्रवृद्धि दर निकालें तो निफ्टी में लगा धन इन 23 सालों में हर साल 14.08% बढ़ा है। एफडी पर टैक्स के बाद रिटर्न 6-7% से ज्यादा नहीं बनता। शेयर बाज़ार में लंबे समय के निवेश का यही फायदा है। ध्यान दें किऔरऔर भी

नोट छापना आसान है, कमाना नहीं। वरना हर कोई शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से जमकर कमा रहा होता। आम सोचवालों के लिए ट्रेडिंग से कमाई शेर के जबड़े से शिकार निकालने जैसा काम है। सामने बैठे हैं उस्तादों के उस्ताद, जो भीड़ की हर मानसिकता का इस्तेमाल बखूबी करते हैं। अक्सर कम सतर्क लोगों को छकाने के लिए झांसा/ट्रैप बिछाते हैं जो दिखता है शानदार मौका, लेकिन फंसाते ही निगल जाता है। अभी क्या है इनका ट्रैप…औरऔर भी

म्यूचुअल फंड मूलतः शेयर बाज़ार तक आम/रिटेल निवेशकों की पहुंच बनाने के लिए बने हैं। लेकिन अपने यहां रिटेल निवेशक लगातार उनसे दूर होते जा रहे हैं। कमाल की बात यह है कि दूसरी तरफ म्यूचुअल फंडों की आस्तियां बढ़ती जा रही हैं जिससे उनके फंड मैनेजरों का वेतन भी बढ़ रहा है। आस्तियों या एयूएम के बढ़ने की खास वजह है कि कंपनियों और अमीर लोगों के लिए म्युचुअल फंडों की ऋण स्कीमें ब्याज कमाने काऔरऔर भी