अंदर के तरकश में छिपे तीर जीत के

पिछले कुछ महीनों से शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग के बारे में गंभीरता से पढ़ रहा हूं तो लग रहा है कि यहां कितने चौकन्नेपन और फुर्ती की मांग है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। हमारी सोच, भावना और बर्ताव में ऐसी चीजें घुसी हुई हैं, जो हमारी ही दुश्मन हैं। सोच की लगाम हमारे अवचेतन के हाथ में है जिसे हम जानकर नहीं, मानकर चलते हैं। इसे जानकर बदले बगैर हम अपने बर्ताव को दुरुस्त नहीं कर सकते। और, नतीजतन ट्रेडिंग करते वक्त अक्सर फिसलकर गिरने का खतरा बना रहता है।

हम या कोई और सिर्फ आपकी सहायता कर सकता है। वो कुछ नए इनपुट ही दे सकता है। सही वक्त पर सही एक्शन लेना आपका काम है। हम आपका काम केवल आसान भर कर सकते हैं, पूरा नहीं कर सकते। सबसे पहले आपको स्वीकार करना पड़ेगा कि शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग इस धरती का सबसे कठिन बिजनेस वेंचर है। क्यों? क्योंकि इसका वास्ता धन जैसे बेहद महत्वपूर्ण व फिसलनेवाली चीज़ से है और सौदे के हर टिक पर या तो आप धन कमाते हो या गंवाते हो। लेकिन मामला यहीं तक सीमित नहीं है।

धन हमारे समाज की ही धुरी नहीं है। यह हमारी पहचान, हमारी अस्मिता से भी जुड़ा है। अगर आप मुनाफा कमा रहे हैं तो खुद को ताकतवर, काबिल, बुद्धिमान और आकर्षक महसूस करते हो। वहीं आप नुकसान खाते हैं तो अपने आपको अशक्त, नाकारा, मूर्ख और भद्दा समझने लगते हैं। असल में आप बाज़ार में जब भी सक्रिय होते हो तो आप चाहे-अनचाहे अपने व्यक्तित्व, अपनी सोच को अभिव्यक्त करते हैं। इस दौरान आपका बर्ताव आपके अवचेतन में बसी धारणाओं और मान्यताओं से संचालित होता है।

बाज़ार आपके पूरे चरित्र, आपकी हर कमज़ोरी की परीक्षा लेता है। अतिविश्वास, अहंकार, भावना, घबराहट, लालच, डर – ये सभी हमारे चेतन-अवचेतन में रचे-बसे ऐसे भाव हैं जिनसे बाज़ार हर पल खेलता है। हमारा दिमाग पैटर्न खोजने और मिथ बनाने का आदी है। लेकिन बाज़ार में बराबर ऐसे पैटर्न और मिथ टूटते रहते हैं। जैसे, आम धारणा है कि देश की अर्थव्यवस्था या जीडीपी बढ़ेगा तो शेयर अपने-आप बढ़ेंगे। लेकिन चीन का जीडीपी पिछले सालों में इतना बढ़ा। मगर वहां का शेयर बाज़ार धूल चाट रहा है। अपने यहां तो और भी विकट स्थिति है क्योंकि अर्थव्यवस्था में इतना कुछ असंगठित है कि जीडीपी उसे समेट ही नहीं पाता।

पहले कहा जाता था कि कोई शेयर अगर बुक वैल्यू से नीचे है तो सस्ता है और आगे हर हाल में बढ़ेगा। आज इस धारणा की धज्जियां उड़ चुकी हैं। टीवी-18 और एनडीटीवी जैसे शेयर अगर आकाश से पाताल तक जा गिरे हैं तो ये न जाने कब तक पाताल में ही पड़े रहेंगे। कहने का मतलब यह है कि हर धारणा समय के साथ पुरानी पड़ जाती है और हमने नई प्रासंगिक धारणा को नहीं पकड़ा तो शेयर बाज़ार हमें रौद डालेगा।

सवाल उठता है कि आप सच को स्वीकार नहीं करेंगे तो उसे बदल कैसे सकते हैं। और, सच्चाई को सही तरीके से देखने-समझने के लिए अपनी तमाम धारणाओं को छोड़ना पड़ सकता है। हम बहुत सारी चीजें आदतन किए चले जाते हैं। इनसे निकलने और खुद को बदलने का एक ही तरीका है आत्म-निरीक्षण, खुद को ही अपने से बाहर निकलकर देखना। अभी कुछ दिन पहले आम आदमी पार्टी (आप) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल का इंटरव्यू सुन रहा था, जिसमें वे बताते हैं कि पिछले 20 सालों से वे नियमित रूप से विपासना करते रहे हैं। सीधी-सी बात है कि जो अपने को नहीं देख पाएगा, वह न खुद को और न ही समाज को बदल पाएगा।

यह बात ट्रेडिंग में कामयाबी से भी जुड़ी हुई है। अपने से पूछिए कि आप वो चीजें क्यों करते चले जा रहे हैं जिन्हें आपको फौरन रोक देना चाहिए? वो कौन है जो आपको सही चीजें करने से रोक देता है? ट्रेडिंग करते वक्त आप ऐसे सवालों से रू-ब-रू होंगे तो वो आपके लिए अपने को खोजने और पाने की यात्रा बन जाएगी। ट्रेडिंग करते वक्त आपका वास्ता दो तरह के डाटा से पड़ता है। एक वो जो बाहरी है, यांत्रिक है। खबरें, शेयरों के भाव, फंडामेंटल व टेक्निकल एनालिसिस, ये इंडीकेटर और वो इंटीकेडर। दूसरा डाटा आंतरिक होता है। इसमें आपके विचार, सोच, भावनाएं और बर्ताव आता है। इनके मेल से बनता है वो परिणाम जो आप ट्रेडिंग से हासिल करते हैं।

शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग 90 से 95 फीसदी मन, मस्तिष्क और भावना का खेल है। जब आप ट्रेड की तैयारी कर रहे होते हैं, विश्लेषण कर रहे होते हैं और उस पर अमल कर रहे होते हैं तो उसके पीछे यही मानसिक और भावनात्मक औजार/सॉफ्टवेयर काम करते हैं। इन्हीं से बनता है आपका स्टीयरिंग ह्वील। इनके बिना आपके दुर्घटना के शिकार हो सकते हैं। आंख पर पट्टी बांधकर भी आप ड्राइव नहीं कर सकते। आपको हर हाल में जानना होगा कि आपकी चाहत को पूरा न होने देने में कौन-सा कर्म या कौन-सी सोच आड़े आ रही है। तभी आप दूसरों की मदद का भी इस्तेमाल कर पाएंगे। नहीं तो सारी ज़िंदगी दूसरों और खुद को गाली देने में चुक जाएगी। खुद को जाने बगैर खुद को बदल नहीं सकते और खुद को बदले बगैर इस दुनिया को जीत नहीं सकते। कृष्ण ने अर्जुन को भावनाओं से ऊपर उठकर खुद को जानना सिखाया था। तभी उनके गांडीव का प्रताप चल सका। हनुमान को भी उनकी शक्ति से परिचित कराने के लिए जामवंत को कहना पड़ा था – का चुप साधि रहा बलवाना।

1 Comment

  1. very nice i also trader from last 18 years i dont agree with your this line सबसे पहले आपको स्वीकार करना पड़ेगा कि शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग इस धरती का सबसे कठिन बिजनेस वेंचर है। i think if your trading principal is tight you never book loss
    so this is a rutin business not a hard business venture on earth
    thanks
    you also do good job for traders knowledge

    again thanks
    ankur

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