जिस तरह हर तरह के बिजनेस या व्यापार की लागत होती है, उसी तरह शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग करने की भी स्पष्ट लागत है जिससे कोई बच नहीं सकता। स्थाई लागत तो हर कोई जानता है जिसमें कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल फोन, वाई-फाई या इंटरनेट कनेक्शन, घर-ऑफिस, ब्रोकरेज़ और एसटीटी वगैरह का खर्च शामिल है। लेकिन इसके अलावा पूंजी की लागत से अक्सर लोग आंख मूंद लेते हैं। इसमें एक है मुद्रास्फीति और दूसरी खास लागत हैऔरऔर भी

आखिर शेयर बाज़ार में थोक व रिटेल भाव का कैसे पता लगाया जाए? व्यापार की तरह यहां कोई डिस्ट्रीब्यूटर या होलसेलर तो होता नहीं, जिससे माल थोक में खरीदकर फुटकर ग्राहकों पर बेच दिया जाए और कस्टमर को डिस्काउंट देने के बाद भी जमकर कमा लिया जाए! जाननेवाले जानते ही होंगे कि भरपूर डिस्काउंट देने के बाद भी डी-मार्ट (एवेन्यू सुपरमार्ट) कितना जमकर कमाता है, जिसके मालिक राधाकृष्ण दामाणी शेयर बाज़ार के भी बहुत पुराने उस्ताद हैंऔरऔर भी

जिसे भी शेयर बाज़ार का सफल ट्रेडर बनना है, उसे सबसे पहले व्यापारी की सूझ-बूझ और धंधे का बुनियादी तौर-तरीका सीखना होगा। सीखना ही नहीं, बल्कि उसे आत्मसात करना होगा, अपने जेहन में गहरे बैठाना होगा। कोई भी व्यापारी थोक के भाव में खरीदता और रिटेल के भाल पर बेचता है। इसी मार्जिन से वह अपनी दुकान के रखरखाव व कर्मचारियों का सारा खर्च निकालने के बाद मुनाफा कमाता है। यह मुनाफा इतना होता है कि अपनाऔरऔर भी

महंगाई क्यों बढ़ी या घटी, व्यापारी इस चक्कर में कभी पड़ता ही नहीं है। उसे इतना भर पता होता है कि अभी चल क्या रहा है। इसी तरह शेयर बाज़ार के ट्रेडर को कभी इस पर मगज़मारी करनी ही नहीं चाहिए कि ऐसा क्यों या वैसा क्यों है। उसे तो बारीकी से यह जानना चाहिए कि अभी, ठीक इस वक्त बाज़ार में चल क्या रहा है। इसके लिए उसे माइक्रोस्कोप लगाना पड़े या टेलिस्कोप, सब चलेगा। लेकिनऔरऔर भी

जिस तरह घोड़े पर अच्छी सवारी करने के लिए उससे जान-पहचान और दोस्ती बनानी पड़ती है, उसी तरह हमें जिन शेयरों में ट्रेड करना है, उसका स्वभाव समझना पड़ता है, उससे अच्छी जान-पहचान बनानी पड़ती है। तभी हम सही मौके पर उन्हें खरीद और बेचकर ट्रेडिंग से मुनाफा कमा सकते हैं। शेयरों का स्वभाव उसमें सक्रिय ट्रेडरों व निवेशकों की प्रवृत्ति से बनता है। कुछ शेयर अच्छे होते हैं, लेकिन लम्बे समय तक चलते ही नहीं। इसलिएऔरऔर भी

शेयरों के भाव बढ़ते हैं क्योंकि धन उनका पीछा करता है। धन उनका पीछा किसी खबर या अनुमान की वजह से करता है। इस चक्र में खबर की खास अहमियत है। लेकिन शेयर बाज़ार में कोई खबर सार्वजनिक रूप से ही सबके लिए बाहर आती है। अप्रकाशित या अघोषित खबर पर ट्रेडिंग करना इनसाइडर ट्रेडिंग हैं और ऐसा करना दंडनीय अपराध है। लेकिन अपने यहां खुद कंपनी प्रवर्तक ही अपने शेयरों में खेल करते और करवाते हैं।औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग अंततः विशुद्ध रूप से शत-प्रतिशत सट्टेबाज़ी है, भले ही हम उसे वित्तीय आज़ादी पाने, अपना बॉस खुद बनने या मुद्रास्फीति से लड़ने के माध्यम जैसा कितना भी सम्मानजनक नाम क्यों न दे दें। इसे हर किसी को स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसके बाद असली मसला यह बचता है कि इस सट्टेबाज़ी के तत्व को कम से कम करने के लिए हम बाज़ार में सक्रिय शक्तियों के संतुलन की संभाव्य समझ किस हद तकऔरऔर भी

हर कोई शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग इसीलिए करता है कि जब शेयरों के भाव बढ़ेंगे तो बेचकर मुनाफा कमा लेंगे। यह अलग बात है कि इसी बाज़ार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो शेयरों के भाव गिरने पर कमाते हैं। लेकिन उनका पूरा तंत्र और तरीका अलग है। फिलहाल तो अहम सवाल यह है कि शेयरों के भाव क्यों बढ़ते हैं? जवाब है कि इसके पीछे धन की महिमा है। धन जिन शेयरोंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार से बिना धांधली या घोटाले के कितना कमाया जा सकता है इसकी मिसाल हैं राकेश झुनझुनवाला। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी सीख भारत के सभी निवेशकों व ट्रेडरों के लिए प्रतिमान है। बाप मुंबई में इनकम टैक्स कमिश्नर थे तो धन-दौलत और शान-ओ-शौकत की कोई कमी नहीं थी। लेकिन बेटे को शेयर बाज़ार में लगाने के लिए पैसे देने से मना कर दिया और हिदायत दी कि वो दोस्तों से भीऔरऔर भी

मुद्रास्फीति रोकने का ज़िम्मा रिजर्व बैंक का है। उसके पास इसे निभाने के लिए एकमात्र साधन मौद्रिक नीति है। ब्याज दर बढ़ाकर वह धन महंगा करता है, सीआरआर बढ़ाकर मुद्रा का प्रवाह कम करता है। लेकिन अपने यहां खाद्य वस्तुओं की महंगाई सरकारी नीतियों से बढ़ती है। कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव घटे। लेकिन केंद्र ने उसका लाभ उपभोक्ता तक पहुंचने नहीं दिया। एक्साइज़ बढ़ाकर उसने आठ साल में करीब 25 लाख करोड़ रुपए का टैक्स बजटऔरऔर भी