पहले विश्व बैंक ने आगाह किया कि अगले कुछ सालो में विश्व अर्थव्यवस्था की विकास दर घटकर 2.2% पर आ सकती है। अब आईएमएफ ने भी आर्थिक सुस्ती की चेतावनी दे दी है। ऐसे में भारत अप्रभावित नहीं रह सकता। एचडीएफसी समूह के मुखिया और देश की मशहूर कॉरपोरेट हस्ती दीपक पारेख मानते हैं कि वैश्विक हालात को देखते हुए भारत की विकास दर आगे धीमी पड़ सकती है। उन्होंने बीते शनिवार को एक समारोह में कहाऔरऔर भी

विश्व बैंक का कहना है कि भारत की आर्थिक विकास दर चालू वित्त वर्ष 2023-24 में इसलिए कम रहेगी क्योंकि उधार महंगा होने और आमदनी में कम बढ़त से निजी उपभोग में कमी आएगी। लेकिन रिजर्व बैंक कहता है कि हमारा जीडीपी ज्यादा बढ़ेगा क्योंकि रबी की अच्छी फसल से ग्रामीण मांग बढ़ेगी, सरकार के ज्यादा पूंजीगत व्यय से मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में क्षमता इस्तेमाल का स्तर उठेगा, बैंक ऋण दहाई अंक में बढ़ रहे हैं और जिंसोंऔरऔर भी

रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2023-24 की पहली मौद्रिक नीति समीक्षा में बैंकों को दिए जानेवाले अल्पकालिक धन पर ब्याज दर या रेपो रेट को 6.5% पर जस का तस रखा है। लेकिन जीडीपी की विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 6.5% कर दिया है। दो महीने पहले फरवरी में ही उसी ने 6.4% विकास दर का अनुमान लगाया था। आखिर फरवरी और अप्रैल के बीच ऐसा क्या हो गया कि रिजर्व बैंक को लगा कि हमारीऔरऔर भी

वाणिज्य व उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने देश के निर्यात को 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तब रखा है, जब वैश्विक मांग मंद पड़ने से तीन महीनों से लगातार वो घट रहा है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक फरवरी में वो 8.82% घटा है। विश्व में आर्थिक सुस्ती या आसन्न मंदी और हमारे घटते निर्यात का असर अंततः यह हो सकता है कि अमेरिका से लेकर यूरोप और चीन व जापान तक की तमाम कंपनियां अपनाऔरऔर भी

जब विश्व अर्थव्यवस्था की नब्ज़ डूब रही हो, तब भारत का निर्यात कैसे सात साल में 2030 तक तीन गुना बढ़कर 2000 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा? वह भी तब, जब 2015-20 की पिछली व्यापार नीति में इसे 2020 तक 900 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य था और तीन साल बाद 2023 तक भी वो मात्र 760 अरब तक पहुंचने जा रहा है! असल में अपने यहां पिछले कुछ सालों में घोषणाएं आर्थिक लक्ष्य हासिल करनेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार अंततः अर्थव्यवस्था की छाया होता है। अर्थव्यवस्था काम की आर्थिक नीतियों से मजबूत बनती है। काम की आर्थिक नीतियां तब बनती हैं जब वे ज़मीनी हकीकत पर आधारित होती हैं। लेकिन अपने यहां विचित्र स्थिति है क्योंकि काम की नहीं, नाम की आर्थिक नीतियां बनाई जा रही हैं। हमारे वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार, 31 मार्च को नई विदेश व्यापार नीति घोषित की। इसके दो दिन पहले ही विश्व बैंक की रिपोर्ट आई थीऔरऔर भी

विश्व बैंक ने अपनी एक नई रिपोर्ट में कहा है कि 2023 से 2030 के बीच विश्व की औसत विकास दर 30 साल के न्यूनतम स्तर 2.2% सालाना पर आ सकती है। चालू सदी के पहले दशक में यह औसत दर 3.5% सालाना रही थी। विश्व बैंक का कहना है कि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को ज्यादा ही झटका लग सकता है। साल 2000 से 2010 तक के दशक में उनकी जो औसत आर्थिक विकास दर 6%औरऔर भी

पिछले नौ सालों से भरपूर सरकारी संरक्षण में भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की पुरज़ोर कोशिशें हो रही हैं। वैसे,  ऐसा कर पाना संभव नहीं दिखता। लेकिन इतने सालों में सरकार ने इतना ज़रूर किया कि भारत के आर्थिक विकास को हिंदू विकास दर पर ज़रूर ला पटका। हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर अक्टूबर-दिसंबर 2022 की तिमाही में मात्र 4.4% रही है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और शिकागो यूनिवर्सिटी में फाइनेंस के प्रोफेसर, रघुराम राजन काऔरऔर भी

भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना किसी आर्थिक योजना का नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं को भुनाने का एक राजनीतिक छलावा है, जुमला है। हम इसे हासिल भी कर लें तो प्रति व्यक्ति 3472 डॉलर सालाना की मध्यम आय वाला देश ही बने रहेंगे। रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके ख्यात अर्थशास्त्री सी. रंगराजन का कहना है कि विकसित व उच्च-मध्यम आय वाला देश बनने के लिए हमारी प्रति व्यक्ति आय कम से कम 13,205औरऔर भी

बीते साल 1 दिसंबर 2022 तो जब से निफ्टी 18,885 अंक के ऊपर गया, तभी से हल्ला था कि वो कभी भी 20,000 अंक के पार जा सकता है। लेकिन चार महीने बीतते-बीतते भी ऐसा होने के कोई आसार नहीं दिख रहे। जिन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लाए धन पर शेयर बाज़ार चढ़ा था, वे खरीदने के बजाय बराबर बेचे जा रहे हैं। इसलिए हमारे बाज़ार की हवा निकली पड़ी। कारण यह भी है कि छोटे समयऔरऔर भी