किसी भी अर्थशास्त्री से पूछें कि भारतीय अर्थव्यवस्था के बढ़ने की सबसे बड़ी रुकावट क्या है तो दस में नौ का जवाब होगा कमज़ोर इंफ्रास्ट्रक्चर। अगर आज हमारा कॉरपोरेट क्षेत्र नमो-नमो कहते हुए नरेंद्र मोदी की जयकार कर रहा है तो उसकी बड़ी वजह यह है कि उसे लगता है कि मोदी प्रधानमंत्री बने तो देश का इंफ्रास्ट्रक्चर सुधर  सकता है। यह उम्मीद आगे दबाव का काम करेगी। इसलिए आज तथास्तु में इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी एक कंपनी…औरऔर भी

मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू। दांव से कितना मिलेगा, इस पर तो हम बल्ले-बल्ले करते हैं। लेकिन क्या दांव पर लगा है, इसे अक्सर भुलाए रहते हैं। शेयर बाज़ार में हम जैसे ही कोई ट्रेड करते हैं, रिवॉर्ड की संभावना के साथ रिस्क की आशंका चील की तरह उसके ऊपर मंडराने लगती है। सुमेरु पर्वत को कोई कृष्ण ही उंगली पर उठा सकता है। पर पक्का जान लें कि रिटेल निवेशक या ट्रेडर होने के नाते हम बाज़ारऔरऔर भी

इंसान होने के नाते हमारी दो बुनियादी कमज़ोरियां हैं। एक, हम सीधी-साधी चीज़ तक को जटिल बना देते हैं। दूसरे, हम बराबर नए-नए भ्रम बनाते जाते हैं। इन कमज़ोरियों को हम मिटा तो नहीं सकते। लेकिन भान हो जाए तो इनका असर न्यूनतम सकते हैं। उसी तरह जैसे गुरुत्वाकर्षण के नियम को बदल नहीं सकते। लेकिन उसे जान लेने के बाद हवा में हज़ारों टन का जहाज़ उड़ा सकते हैं। अब बढें शुक्रवार की ट्रेडिंग की ओर…औरऔर भी

कल एग्ज़िट-पोल आ ही रहे थे कि एक अभिन्न मित्र का फोन आया। बोले, मुझे लगता है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी को छब्बीस सीटें मिलेंगी। मैंने पूछा, कैसे? बोले, कुछ नहीं, बस मेरा अंतर्मन कह रहा है। लेकिन यह आपके अंतर्मन की नहीं, औरों का मन समझने की बात है। बोले, इन्ट्यूशन भी तो होता है। दोस्तों! शेयर बाज़ार में भी बहुतेरे लोग यही इन्ट्यूशन चलाकर बराबर मुंह की खाते हैं। अब रुख बाज़ार का…औरऔर भी

कोने-कोने में बैठे हैं शेयर बाज़ार के सैकड़ों घाघ। बड़ौदा में बैठे एक घाघ के मुरीद दो महीने बता रहे थे कि साहब को क्रिस्टल-बॉल पर साफ-साफ दिखता है कि निफ्टी कहां जाएगा। शनिवार को मिले तो बोले, सब साले धोखेबाज़ हैं। दस दिन में 100 कमवाया तो एक दिन में सीधे 200 का फटका। दरअसल ये सभी पोंगापंथी हैं। लगा तो तीर नहीं तो तुक्का। इसलिए चमत्कार को मारकर लात चलें सीधे-सच्चे रास्ते पर। अब आगे…औरऔर भी

सोच में बुनियादी खोट हो तो वह हर तरफ रायता फैला देती है। मानव मनोविज्ञान से शेयरों की खरीद-फरोख्त प्रभावित होती है। लेकिन इस सोच को इतना खींच ले जाना कि चांद तेल व गैस, गुरु और शनि मेटल और सूर्य फार्मा शेयरों के भाव तय करता है, यकीनन किसी और का शिकार बनना है। अरे! भाव कोई भगवान या ग्रह-नक्षत्र नहीं चलाते। इसे लोग उठाते/गिराते हैं। ग्रहों की चाल नहीं, उनका मन समझिए। अब असली बात…औरऔर भी

दुनिया में आज से नहीं, सदियों से थोथा बहुत और सार कम है। कबीरदास की सीख थी कि सार-सार को गहि रहय, थोथा देय उड़ाय। फाइनेंस व ट्रेडिंग में भी 90% शोर और 10% सार होता है। अगर हम चार्ट देखकर बाज़ार में खरीदने और बेचनेवालों के सही संतुलन को समझना चाहते हैं तो शोर को दरकिनार कर सार को पकड़ना होगा, जिस तक पहुंचने का सबसे शानदार सॉफ्टवेयर है हमारी बुद्धि। अब पकड़ें आज का बाज़ार…औरऔर भी

जब देश के भीतर और देश के बाहर अनिश्चितता का माहौल कुछ ज्यादा ही गहरा हो चला हो, तब हमें उन्हीं कंपनियों में निवेश करना चाहिए जो तगड़ी होड़ में भी सीना तानकर खड़ी ही नहीं, लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे माहौल में कमज़ोर पर दांव लगाना अपनी बचत को जान-बूझकर चक्रवात में फंसाने जैसा है। हमें तो वही कंपनी चुननी चाहिए, मजबूत होते हुए भी जिसका दाम गिरा हुआ है। तथास्तु में ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

हम हिंदुस्तानी जुगाड़ तंत्र में बहुत उस्ताद हैं। फाइनेंस और शेयर बाज़ार दुनिया में उद्योगीकरण में मदद और उसके फल में सबकी भागीदारी के लिए विकसित हुए। लेकिन हमने उसे भोलेभाले अनजान लोगों को लूटने का ज़रिया बना लिया। इसलिए शेयर बाज़ार की ठगनेवाली छवि हवा से नहीं बनी है। पिछले हफ्ते हमारे एक सुधी पाठक के एस गुप्ता जी ने एक किस्सा लिख भेजा कि शेयर बाज़ार में पैसा कैसे डूबता है। वो किस्सा यूं है…औरऔर भी

दो पाटों के बीच फंसा है अपना शेयर बाज़ार। आज शाम आंकड़ा आएगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कितनी बढ़ी है। उम्मीद से ज्यादा तो शेयर बाजार चहक उठेगा। वहीं अमेरिकी अर्थव्यवस्था अगर उम्मीद से ज्यादा बढ़ गई तो हमारा शेयर बाज़ार सहम जाएगा क्योंकि इससे यहां सस्ते धन का आना थम सकता है। आर्थिक बढ़त के दो अलग असर। कुछ यूं ही चले है शेयर बाज़ार। अब हफ्ते की आखिरी ट्रेडिंग…औरऔर भी