भारत सरकार के कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय ने निवेशकों को खींचने के लिए देश में व्यापक अभियान चला रखा है। इसके तहत उसने 12-17 जुलाई तक एक निवेशक सप्ताह भी मनाया। इसी दौरान उसने छोटी-सी पुस्तिका छपवाई है जिसका शीर्षक है – ए बिगिनर्स गाइड टू द कैपिटल मार्केट। इसमें बहुत सारी बातों के अलावा निवेश के बीस मंत्र सुझाए गए हैं, जिसमें से चौथा मंत्र आईपीओ (शुरुआती पब्लिक ऑफर) में निवेश को लेकर है, जिसे जानकर किसीऔरऔर भी

बीमा नियामक संस्था, आईआरडीए (इरडा) पॉलिसीधारकों के हितों से जुड़े नियमों में बदलाव की तैयारी में जुट गया है। इस सिलसिले में उसने नए संशोधित नियमों का प्रारूप पिछले महीने की 18 तारीख को जारी किया था, जिस पर सभी संबंधित पक्षों से 5 जुलाई तक प्रतिक्रिया व सुझाव मांगे गए थे। अब सारे सुझावों के मिल जाने के बाद इरडा की कोशिश है कि नए नियमों को जल्दी से जल्दी कानूनी स्वरूप दे दिया जाए। हालांकिऔरऔर भी

सरकार की कथनी, करनी और सोच में भारी अंतर है। एक तरफ वह पूंजी बाजार को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहती है, दूसरी तरफ पब्लिक इश्यू में उसने रिटेल (एक लाख रुपए से कम निवेश करनेवाले) निवेशकों की संख्या महज 35 फीसदी तक सीमित कर दी है, जबकि पहले क्यूआईबी (क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल खरीदार) जैसे बड़े निवेशक नहीं थे और पूरे के पूरे इश्यू पब्लिक के लिए ही थे। यह कहना है पूंजी बाजार से जुड़ीऔरऔर भी

आम भारतीय मानसिकता संपत्ति को भौतिक रूप में देखने-महसूस करने की है। हम धन को गाड़कर रखते रहे हैं। अब भी जमीन से हमारा गहरा जुड़ाव है और हमारी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा संपत्ति को भौतिक रूप में ही देखना चाहता है। लेकिन डीमैट के इस दौर में संपत्ति को भौतिक रूप से देखने का मनोविज्ञान नहीं चल सकता। इसे तोड़ना होगा, बदलना होगा, जिसके लिए शिक्षा जरूरी है। इससे हम नक्सली हिंसा व अशांति कोऔरऔर भी

इनफोसिस टेक्नोलॉजीज जैसी नामी कंपनी को भी छोड़कर जानेवालों की कमी नहीं है। इनफोसिस देश में टीसीएस के बाद दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी है। वहां काम का माहौल जबरदस्त माना जाता है। कंपनी ने इसी 2 जुलाई को अपनी तीसवीं सालगिरह पर सभी कर्मचारियों को 5.69 लाख शेयर मुफ्त में बांटे हैं। लेकिन इसके बावजूद चालू वित्त वर्ष 2010-11 में अप्रैल-जून की पहली तिमाही में उसे छोड़कर जानेवाले कर्मचारियों की संख्या 15.8 फीसदी बढ़ गई है।औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों और गैर-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों को हिदायत दी है कि वे क्रेडिट कार्ड के कामकाज के बारे में बिना किसी लाग-लपेट के तय दिशानिर्देशों का पालन करें, नहीं तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी, जिसमें जुर्माना लगाना भी शामिल है। रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को बाकायदा एक अधिसूचना जारी कर यह निर्देश दिया है। असल में इधर रिजर्व बैंक से लेकर बैंकिंग ओम्बड्समैन के कार्यालयों को क्रेडिट कार्डधारकों से बराबर शिकायतें मिलऔरऔर भी

शेयरों के डेरिवेटिव सौदों में फिजिकल सेटलमेंट की व्यवस्था अपनाने पर महीने भर के भीतर अंतिम फैसला हो जाएगा। यह कहना है पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी के चेयरमैन सीबी भावे। वे गुरुवार को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में सर्टिफिकेशन एक्जामिनेशन फॉर फाइनेंशियल एडवाइजर्स (सीएफए) के लांचिंग समारोह के दौरान मीडिया से बात कर रहे थे। उनका कहना था, “स्टॉक एक्सचेंजों के साथ तमाम मसलों पर विमर्श हो चुका है और महीने भर के भीतर अंतिम फैसलाऔरऔर भी

दो साल पुराने वैश्विक वित्तीय संकट के बाद बैंकिंग व फाइनेंस क्षेत्र के निवेश को सबसे ज्यादा जोखिम भरा माना जाने लगा है। लेकिन हमारे म्यूचुअल फंडों ने अपना सबसे ज्यादा निवेश इसी क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों में कर रखा है। पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी को एम्फी (एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया) के मिली जानकारी के मुताबिक मई अंत तक  म्यूचुअल फंडों ने अपनी कुल आस्तियों का 14.14 फीसदी हिस्सा बैंकों और 5.01 फीसदीऔरऔर भी

वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने 22 जून को देश के बाहर अमेरिका में बयान दिया था कि रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को क्रमबद्ध रूप से बढ़ाया जाएगा और इसके ठीक दो हफ्ते बाद ही वाणिज्य मंत्रालय के औद्योगिक नीति व संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) ने मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र को एफडीआई के लिए खोलने पर 21 पन्नों का बहस-पत्र पेश कर दिया। इस पर 31 जुलाई तक सभी संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया मांगी गई है।औरऔर भी