पूंजी बाजार नियामक संस्था भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने जस्टिस डीपी वाधवा समिति की रिपोर्ट पर अमल के लिए एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त कर दिया है। रिटायर्ड मुख्य आयकर आयुक्त और सेबी के पूर्व कार्यकारी निदेशक विजय रंजन को यह जिम्मा सौंपा गया है। यह मामला साल 2003 से 2005 के बीच आए 21 आईपीओ (प्रारंभिक सार्वजनिक ऑफर) का है, जिसमें हजारों बेनामी डीमैट खाते खुलवाकर रिटेल निवेशकों के हिस्से के शेयर हासिल कर लिए गए थेऔरऔर भी

इस साल अभी तक स्थिति यह रही है कि बैंक हर दिन औसतन 1.09 लाख करोड़ रुपए रिजर्व बैंक के पास रिवर्स रेपो की सुविधा के तहत जमा कराते रहे हैं जिस पर उन्हें महज 3.25 फीसदी सालाना की दर से ब्याज मिलता है। बैंकिंग सिस्टम में इस राशि को अतिरिक्त तरलता माना जाता है। यह वह राशि है जो आम लोगों से लेकर औद्योगिक क्षेत्र को उधार देने और विभिन्न माध्यमों में निवेश करने के बादऔरऔर भी

देश के बैक सड़क से लेकर बिजली जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र को ऋण देते-देते परेशान हो गए हैं। इस साल उन्होंने कुल मिलाकर उद्योग क्षेत्र को 14 फीसदी ही ज्यादा कर्ज दिया है जिसके चलते रिजर्व बैंक को कर्ज में इस वृद्धि का लक्ष्य 18 से घटाकर 16 फीसदी करना पड़ा है। लेकिन इस दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र को बैंकों से मिले कर्ज में 46 फीसदी की शानदार वृद्धि हुई है। यह कहना है खुद रिजर्व बैंक के डिप्टीऔरऔर भी

आम निवेशकों से करोड़ों की रकम जुटाकर लापता हो चुकी 121 कंपनियों की सूची तो कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय ने बड़ी प्रमुखता से अपनी वेबसाइट पर पेश कर रखी है। इसमें बताया गया है कि कैसे कोलकाता की वेस्टर्न इंडिया इंडस्ट्रीज निवेशकों से 232.60 करोड़ जुटाकर लापता हो चुकी है। लेकिन इस बात पर न तो मंत्रालय और न ही पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी का कोई ध्यान है कि देश के दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों बीएसईऔरऔर भी

कुल विदेशी निवेश में एफडीआई का हिस्सा 30.04 फीसदी है तो पोर्टफोलियो निवेश है 20.45 फीसदी। देश में दीर्घकालिक निवेश के लिए आ रही है ज्यादा पूंजी और घट रहा है हॉट मनी का हिस्सा। देश में हो रहे कुल विदेशी निवेश में प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का हिस्सा पिछले एक साल से बढ़ रहा है और अब यह पोर्टफोलियो निवेश से ज्यादा हो गया है। भारत के अंतरराष्ट्रीय निवेश पर जारी रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट केऔरऔर भी

पिछले मार्च से इस मार्च के बीच अमेरिकी सरकार के बांडों में भारत का निवेश तीन गुना से ज्यादा हो गया है। देश की तरफ से तकरीबन 99 फीसदी निवेश भारतीय रिजर्व बैंक अपने विदेशी मुद्रा खजाने से करता है। वित्तीय संस्थाओं और कॉरपोरेट क्षेत्र की तरफ से किया गया निवेश एक फीसदी से भी कम रहता है। यूएस ट्रेजरी विभाग की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2008 तक अमेरिकी सरकार के बांडों मेंऔरऔर भी

मंदी से मुक्त माना जानेवाला माइक्रो फाइनेंस क्षेत्र भी अब आर्थिक सुस्ती का शिकार हो गया है। इस क्षेत्र को बैंकों से मिलनेवाला धन कुछ साल पहले तक मिल रहे धन का अब मामूली हिस्सा रह गया है। बैंक माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं (एमएफआई) को बगैर बैलेंस शीट देखे कर्ज देने से मना कर रहे हैं। इससे छोटी एमएफआई के लिए भारी मुसीबत पैदा हो गई है क्योंकि वे आमतौर पर बैलेंस शीट नहीं बनाती। केवल बड़ी एमएफआईऔरऔर भी

देश में म्यूचुअल फंडों के निवेशकों की संख्या 4.33 करोड़ है जिनमें से 4.20 करोड़ (96.86 फीसदी) आम निवेशक है, जबकि कॉरपोरेट व संस्थागत निवेशकों की संख्या महज 5.02 लाख  (1.16 फीसदी) है। लेकिन म्यूचुअल फंडों की शुद्ध आस्तियों में से 56.55 फीसदी पर कॉरपोरेट व संस्थागत निवेशकों का कब्जा है, जबकि इतनी भारी तादाद के बावजूद इसमें आम निवेशकों की हिस्सेदारी महज 36.93 फीसदी है। वह भी तब, जब संस्थागत निवेशकों में अनिवासी भारतीय और विदेशीऔरऔर भी

रिजर्व बैंक रेपो और रिवर्स रेपो दरों में बार-बार कमी किए जाने बावजूद बैंकों के कर्ज की रफ्तार न बढऩे से चिंतित है। तीन हफ्ते पहले ही रिवर्स रेपो दर को घटाकर 3.5 फीसदी कर दिया गया है, फिर भी बैंक उसके पास इसके तहत हर दिन हजारों करोड़ रुपए जमा करा रहे हैं। रिजर्व बैंक बैंकों को ऐसा करने से रोकने के लिए तरलता समायोजन सुविधा (एलएएफ) के अंतर्गत हर दिन दो बार खोली जानेवाली यहऔरऔर भी

भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की बहुचर्चित जीवन आस्था पॉलिसी की परिपक्वता पर बीमाधारक को मिलनेवाले रिटर्न पर टैक्स देने को लेकर अब भी असमंजस बना हुआ है और इन पर एलआईसी या बीमा नियामक संस्था आईआरडीए नहीं, बल्कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ही कोई स्पष्ट राय पेश कर सकता है। एलआईसी के प्रवक्ता ने कहा कि इस एकल प्रीमियम पॉलिसी को आईआरडीए के साथ पूरे विचार विमर्श के बाद बनाया गया था। लेकिन पांच याऔरऔर भी