बजट ने यकीनन बाजार की प्रमुख चिंताओं का ख्याल रखा है। वित्त मंत्री सरकार की बाजार उधारी को 3.45 लाख करोड़ रुपए तक लाने में कामयाब रहे हैं, जबकि एनालिस्ट लोग 4.75 लाख करोड़ की उम्मीद कर रहे थे। यह भी वाकई चौंकानेवाली बात रही कि आयकर में रियायतें दी गई हैं। वह भी तब, जब सरकार को राजस्व जुटाने में मुश्किल आ रही है। सरकार के प्रत्यक्ष कर प्रस्तावों से उसकी कर आमदनी में 26,000 करोड़औरऔर भी

अब तक के इतिहास में केवल वीपी सिंह ऐसे वित्त मंत्री रहे हैं जिन्होंने बाजार बंद रहने के दिन, शनिवार को बजट पेश किया था। इस बार का बजट भी इस मायने में पहला है कि इसके बाद लगातार तीन दिन की छुट्टियां पड़ रही हैं। शनिवार, रविवार और फिर सोमवार को होली। इसलिए हमारे माननीय वित्त मंत्री अपने बजट प्रस्तावों पर बाजार की पूरी प्रतिक्रिया जानने से तीन दिन तक महरूम रह जाएंगे। अमूमन बजट शेयरऔरऔर भी

कभी स्टरलाइट समूह की कंपनी मद्रास एल्युमीनियम की सब्सिडियरी रह चुकी इंडिया फॉयल इस समय इनसाइडर ट्रेडिंग के फेरे में पड़ी हुई है। यह कंपनी बीआईएफआर के हवाले किए जाने के बाद डीलिस्ट हो गई थी। जब यह बीआईएफआर के दायरे से बाहर निकली तो एस डी (ESS DEE) एल्युमीनियम ने इसका अधिग्रहण कर लिया। हालांकि बीआईएफआर से बाहर निकलने में उसे लंबा वक्त लग गया। इसके बाद इंडिया फॉयल में प्रवर्तकों की हिस्सेदारी बढ़कर 89 फीसदीऔरऔर भी

करेंट एकाउंट (सीए) यानी चालू खाते और सेविंग एकाउंट (एसए) यानी बचत खाते को मिला दें तो बनता है सीएएसए यानी कासा। बैंक की कुल जमाराशि में कासा जमा का हिस्सा कितना है, इससे उसकी लागत पर बहुत फर्क पड़ता है। चालू खाते मुख्तया कंपनियां, फर्में व व्यापारी व उद्यमी रखते हैं जो हर दिन खाते से काफी लेन-देन करते हैं। जबकि बचत खाते में हमारे-आप जैसे आम लोग अपना धन जमा रखते हैं और इसका इस्तेमालऔरऔर भी

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) के ताजा आंकड़े आ चुके हैं। दिसंबर में 16.8 फीसदी बढ़त के साथ इसने सोलह सालों का शिखर छू लिया है। भले ही यह छलांग वैश्विक मंदी के दौरान साल भर पहले इसी महीने में 0.2 फीसदी की गिरावट की तुलना में हो, लेकिन इसने हमारी अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौट आने की पुष्टि कर दी है। सोमवार को बाजार खुलेगा तो इस खुशी का खुमार माहौल में छाया रहेगा। ऊपर से सोमवारऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था, सेबी के निर्देश के बावजूद अब भी वितरक/ब्रोकर ग्राहकों के कागजात म्यूचुअल फंड को नहीं दे रहे हैं। सेबी ने बीते दिसंबर माह से ही यह नियम बना दिया हैं कि म्यूचुअल फंड निवेशक को किसी दूसरे ब्रोकर या मध्यस्थ की सेवा लेने के लिए पुराने ब्रोकर से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेने की जरूरत नहीं है। लेकिन ब्रोकर अब भी किसी न किसी बहाने ग्राहक के निवेश संबंधी दस्तावेज देने में आनाकानी करऔरऔर भी

पूंजी बाजार नियामक संस्था भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने जस्टिस डीपी वाधवा समिति की रिपोर्ट पर अमल के लिए एडमिनिस्ट्रेटर नियुक्त कर दिया है। रिटायर्ड मुख्य आयकर आयुक्त और सेबी के पूर्व कार्यकारी निदेशक विजय रंजन को यह जिम्मा सौंपा गया है। यह मामला साल 2003 से 2005 के बीच आए 21 आईपीओ (प्रारंभिक सार्वजनिक ऑफर) का है, जिसमें हजारों बेनामी डीमैट खाते खुलवाकर रिटेल निवेशकों के हिस्से के शेयर हासिल कर लिए गए थेऔरऔर भी

इस साल अभी तक स्थिति यह रही है कि बैंक हर दिन औसतन 1.09 लाख करोड़ रुपए रिजर्व बैंक के पास रिवर्स रेपो की सुविधा के तहत जमा कराते रहे हैं जिस पर उन्हें महज 3.25 फीसदी सालाना की दर से ब्याज मिलता है। बैंकिंग सिस्टम में इस राशि को अतिरिक्त तरलता माना जाता है। यह वह राशि है जो आम लोगों से लेकर औद्योगिक क्षेत्र को उधार देने और विभिन्न माध्यमों में निवेश करने के बादऔरऔर भी

देश के बैक सड़क से लेकर बिजली जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र को ऋण देते-देते परेशान हो गए हैं। इस साल उन्होंने कुल मिलाकर उद्योग क्षेत्र को 14 फीसदी ही ज्यादा कर्ज दिया है जिसके चलते रिजर्व बैंक को कर्ज में इस वृद्धि का लक्ष्य 18 से घटाकर 16 फीसदी करना पड़ा है। लेकिन इस दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र को बैंकों से मिले कर्ज में 46 फीसदी की शानदार वृद्धि हुई है। यह कहना है खुद रिजर्व बैंक के डिप्टीऔरऔर भी