बोलो-बोलो, भेद तो खोलो
बात मन में रखने के कुछ नहीं होगा। कहना जरूरी है। नहीं तो सामनेवाला अपनी दुनिया में मस्त रहेगा और हम अपनी दुनिया में। उसकी तर्क पद्धति व संस्कार भिन्न हैं। वह हमारी बात अपने-आप नहीं समझ सकता।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
बात मन में रखने के कुछ नहीं होगा। कहना जरूरी है। नहीं तो सामनेवाला अपनी दुनिया में मस्त रहेगा और हम अपनी दुनिया में। उसकी तर्क पद्धति व संस्कार भिन्न हैं। वह हमारी बात अपने-आप नहीं समझ सकता।और भीऔर भी
काम पर किसी का नाम नहीं लिखा रहता। आप चूके तो कोई और कर लेगा। यह नियम साहित्य सृजन जैसे विशिष्ट काम पर भी लागू होता है। इसलिए नाम पाना है कि काम को कल पर नहीं टालना चाहिए।और भीऔर भी
बात सोची। आजमाई नहीं। उड़ गई। क्या फायदा? ज्ञान को व्यवहार की कसौटी पर कसना जरूरी है। इसी से उसके सही या गलत होने का पता भी चलता है। नहीं तो हम भ्रम में ही पड़े रहते हैं, खुद को सही माने बैठे रहते हैं।और भीऔर भी
छोटे थे तो मां के हाथों का स्पर्श हमें संवारता था। सुरक्षा की अभेद्य दीवार बन जाता था। इसकी गोद से उसकी गोद हम खिलखिलाते थे। बड़े होते जाते हैं, स्पर्श घटता जाता है और हम असुरक्षित होते चले जाते हैं।और भीऔर भी
अगर आपके पास विचार ही विचार है, लेकिन आप हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं तो आप दिवास्वप्न में जी रहे हैं। आप अगर बिना किसी विचार या दृष्टि के काम किए जा रहे हैं तो वह एक दिन दुःस्वप्न साबित होगा।और भीऔर भी
अनंत चुम्बकीय क्षेत्रों से घिरे हैं हम। इन्हीं में से एक चुम्बकीय क्षेत्र हमारा भी है। इन्हीं के बीच के आकर्षण-विकर्षण से फूल से लेकर विचार तक खिलते हैं। उनमें सिमिट्री, संतुलन और सौंदर्य पैदा होता है।और भीऔर भी
जिंदगी जिनके लिए सिर्फ जीते चले जाने का नाम है, उनको कहां कभी इससे किसी तरह का गिला-शिकवा होनेवाला है। इसीलिए एकाध अपवादों को छोड़ दें तो जानवर कभी आत्महत्या नहीं करते।और भीऔर भी
हमने अपनी-अपनी खोली, अपने-अपने कोटर बना रखे हैं और उसी को सारी दुनिया माने बैठे रहते हैं। लेकिन दुनिया तो बहुत व्यापक और विविधत है। हमारे ऊपर है कि हम उसके कितने हिस्से को आत्मसात कर पाते हैं।और भीऔर भी
संकट में धैर्य ही काम आता है। घबराने पर भगवान भी हमसे किनारा कर लेता है क्योंकि वो तो और कुछ नहीं, हमारे अंदर की ही छाया है। और… अशांत जल में कभी भी साफ छाया नहीं बनती।और भीऔर भी
चीज हमारी आंखों के सामने रहती है, पहुंच में रहती है, फिर भी नहीं दिखती क्योंकि हमें उसके होने का भान ही नहीं होता। भान होता भी है तो उसे गलत जगह खोजते रहते हैं। कस्तूरी कुंडलि बसय, मृग ढूंढय बन मांहि।और भीऔर भी
© 2010-2025 Arthkaam ... {Disclaimer} ... क्योंकि जानकारी ही पैसा है! ... Spreading Financial Freedom