आप भाग्यशाली हैं
आप प्रतिकूलताओं से घिरे हैं तो भाग्यशाली हैं क्योंकि इनके बीच ही हमारी सोई शक्तियां जगती हैं। सब ठीक हो तो नई अनुभूति नहीं मिलती। और, अनुभूति ही तो पूंजी है। बाकी तो सभी को विदा खाली हाथ ही होना है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
आप प्रतिकूलताओं से घिरे हैं तो भाग्यशाली हैं क्योंकि इनके बीच ही हमारी सोई शक्तियां जगती हैं। सब ठीक हो तो नई अनुभूति नहीं मिलती। और, अनुभूति ही तो पूंजी है। बाकी तो सभी को विदा खाली हाथ ही होना है।और भीऔर भी
आईने में अपनी छवि से लड़ती गौरैया को देखा है! हम भी इसी तरह अक्सर दूसरों में अपनी छवि से ही लड़ते रहते हैं। लड़ने के बाद भी समझ में आ जाता तो भला होता। पर हम तो अपनी तरफ ताकते तक नहीं।और भीऔर भी
जब अकेला नेता सपने देखता है और लोग उसे हासिल करने में मदद करते हैं तो हिटलरशाही पैदा होने का खतरा रहता है। जब लोग सपने देखते हैं और नेता उसे हासिल करने में मदद करता है तो लोकशाही आती है।और भीऔर भी
झटपट कुछ नहीं मिलता। दही को कुछ समय तक मथने के बाद ही मक्खन निकलता है। कम से कम आधे घंटे की कसरत के बाद ही हमारे मस्तिष्क से तनाव को दूर करने वाले रसायन एन्डोर्फिन का रिसाव होता है।और भीऔर भी
कुछ लोग गलतियां किए चले जाते हैं, सीखते कुछ नहीं। दूसरे लोग अपनी ही गलती से सीखते हैं। तीसरी तरह के लोग अपनी ही नहीं, औरों की गलतियों से भी सीखते हैं। कामयाबी इन्हें ही सबसे जल्दी मिलती है।और भीऔर भी
क्या आप हर दिन पौधे को उखाड़कर देखते हैं कि उसकी जड़ें कहां तक पहुंचीं? फिर आप हर दिन निवेश को इतना उलट-पुलट कर क्यों देखते हैं! इससे आपकी नींद हराम होने के अलावा कुछ नहीं मिलता।और भीऔर भी
सच कहें तो धंधा और कुछ नहीं, बस दूसरों से जुड़ने की कोशिश है। उस समान चीज को पकड़ने का उपक्रम है जो सबमें है, सबकी जरूरत है। कंपनियां सर्वे से इसका पता लगाती हैं और ज्ञानी अपनी अंतर्दृष्टि से।और भीऔर भी
यहीं थोड़ी दूर कहीं हमारा बचपन खेल रहा होगा। पड़ोस में कहीं हमारा बुढ़ापा खांस रहा होगा। देखना चाहें तो अपना अतीत व भविष्य अपने ही इर्दगिर्द देख सकते हैं। हम क्या थे, क्या बनेंगे, समझ सकते हैं।और भीऔर भी
मरीचिकाएं रेगिस्तान में ही नहीं, जीवन में भी होती हैं। पत्ते आम के होते हैं, लेकिन पेड़ बबूल का होता है। लोग जैसे दिखते हैं, होते नहीं। दूर से अंदर की परतें नहीं दिखतीं, जबकि यही तो असली हैं, बाहर बस खोल है।और भीऔर भी
हम सभी अपने वर्तमान से दुखी, अतीत पर मुग्ध और भविष्य को लेकर डरे हुए क्यों रहते हैं? क्या हम आज को लेकर मगन, बीत चुके पल के प्रति निर्मम और आनेवाले कल को लेकर बिंदास नहीं हो सकते?और भीऔर भी
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