सुखी हैं, संपन्न हैं। लेकिन खुश कौन है? जो जितना मुक्त है, उतना खुश है। और, किसी चीज को जान लेना उससे मुक्त हो जाना है। इस हद तक जान लेना कि सवालों से निकलने वाली हर कड़ी सुलझ जाए।और भीऔर भी

कभी जमीन पर जीत मायने रखती थी। राज और राजा का जमाना था। लेकिन आज तो सारी लड़ाई दिमाग पर कब्जे की है। हर कोई इसी में लगा है। जो जितने ज्यादा दिमाग जीत लेगा, वह उतना बड़ा सम्राट है।और भीऔर भी

जानने की पहली सीढ़ी है सवाल। जिसके पास भी सवाल होंगे, उसे उनका जवाब मिल जाएगा। सब कुछ है इस दुनिया में। हां, इतना जरूर है कि यहां कुछ भी पाने से पहले उसकी पात्रता हासिल करनी पड़ती है।और भीऔर भी

प्रकृति और हमारे बीच मां-बच्चे का रिश्ता है। इसलिए उसे समझना और उसके हिसाब से ढलना मुश्किल नहीं होता। लेकिन समाज और उसके विभिन्न अवयवों को बगैर माथापच्ची के नहीं समझा जा सकता।और भीऔर भी

कोई भी विचारधारा हमेशा के लिए नहीं होती क्योंकि रूढ़ियां उसे घेरकर बेजान बना देती हैं। पानी का आकार लोटे में कैद हो जाता है। इसलिए विचारधारा के प्राणतत्व को बराबर परिमार्जित करते रहना पड़ता है।और भीऔर भी

ये सही, वो गलत। ये अच्छा, वो बुरा। अनजाने में ही नैतिकता की एक तराजू लिए चलते हैं हम। एक माइंड सेट बन जाता है हमारा। लेकिन नया कुछ पाने के लिए पुराने माइंट सेट को ठोंकना-पीटना जरूरी होता है।और भीऔर भी

आकर्षण तभी तक है जब तक हम में नया कुछ रचने की क्षमता है। स्थूल रूप में देखें तो सृजन की क्षमता खत्म होते ही चेहरे और शरीर की रौनक चली जाती है। सृजन और सामाजिक स्वीकृति में भी यही रिश्ता है।और भीऔर भी

हम क्या हैं? अपने शरीर से किस तरह भिन्न हैं? मुझे तो लगता है कि हम इस शरीर के इन-बिल्ट ड्राइवर हैं। और, अच्छा ड्राइवर वही है जो गाड़ी की मेंटेनेंस के साथ-साथ उसे पूरी तरह कंट्रोल में रखना जानता है।और भीऔर भी

धरती गोल है। लगती है चौरस। इस तीन आयामी दुनिया में सब कुछ ऐसा ही लगता है। लेकिन जो लगता है, वही सच नहीं होता। सच तक पहुंचने के लिए चौथी विमा या आयाम यानी समय को फ्रेम में लाना जरूरी है।और भीऔर भी

विनाश के बिना सृजन नहीं होता। और, सृजन में हर किसी की अपनी-अपनी भूमिका होती है। सृजन और विनाश के देवता शंकर के गणों में कोढ़ी, लूले, लगड़े, अपाहिज और भूत-वैताल तक शुमार किए गए हैं।और भीऔर भी