पुरानी निर्जीव चीजें समय बीतने के साथ या तो कचरा बन जाती है या एंटीक बनकर सजावटी हो जाती हैं। लेकिन ज्ञान का सजीव प्रवाह धूमिल भले ही पड़ जाए, कभी कचरा या एंटीक नहीं बन सकता।और भीऔर भी

देखने में सफलता कितनी भी व्यक्तिगत लगे, लेकिन मूलतः वह सामाजिक होती है। कोई विचार कितना ही अच्छा क्यों न हो, वह तब तक सफल नहीं होता जब तक उसे सामाजिक तानाबाना नहीं मिलता।और भीऔर भी

मरना हमारी मजबूरी है। लेकिन जीना भी तो एक तरह की मजबूरी है। मरने की मजबूरी को हम बदल नहीं सकते। लेकिन जीने की मजबूरी को हम चाहें तो अपनी सक्रियता से जश्न में बदल सकते हैं।और भीऔर भी

हर जीव प्रकृति के साथ एक खास संतुलन में जन्मता, पलता व बढ़ता है। संतुलन न बिगड़े तो जीवन चक्र पूरा चलता है। इंसान भी चाहे तो मूल तत्वों के सही संतुलन से खुद को स्वस्थ रख सकता है।और भीऔर भी

हो सकता है कि कोई रेत को मसल कर तेल निकाल ले, मरीचिका से भी अपनी प्यास बुझा ले, गधे तक के सिर पर सींग देख ले, लेकिन एक दम्भी मूर्ख को प्रसन्न कर पाना किसी के लिए भी असंभव है।और भीऔर भी

हर काम हर पल दुनिया में कहीं न कहीं होता रहता है। जीना-मरना, हंसना-रोना, मिलना-बिछुड़ना। अंतहीन छोरों से बंधी डोर उठती है, गिरती है। झूले या सांप नहीं, सागर की लहरों की तरह दौड़ती है जिंदगी।और भीऔर भी

अंधेरे, सुनसान, बियावान सफर के दौरान पीछे से पुकारने वाली आवाजें भुतहा ही नहीं होतीं। कभी-कभी अतीत आपके कंधे पर हाथ रखकर पूछना चाहता है – भाई! कैसे हो, सफर में कोई तकलीफ तो नहीं।और भीऔर भी

जिस समाज में जितनी ज्यादा असुरक्षा होती है, वहां सत्ता की उतनी ही भूख और संतों का उतना ही निरादर होता है। लोग सत्ता के पीछे भागते हैं। संत तक संतई छोड़ सत्ता की जोड़-तोड़ में लग जाते हैं।और भीऔर भी

कहने को कोई कुछ भी कहे, लेकिन बिरले लोग ही औरों के लिए जीते हैं। बाकी ज्यादातर लोग तो अपने या अपनों के लिए ही जीते हैं। वे दूसरों के लिए तभी काम करते हैं, जब उसमें उनका फायदा होता है।और भीऔर भी

विचारों के बुलबुलों या गुब्बारों से कुछ नहीं होनेवाला। वे तो बनते, फूलते और फूट जाते हैं। हमें तो ऐसे स्थाई व पुख्ता विचारों की जरूरत है जो वायुयान की तरह टेक-ऑफ कर हमें नई ऊंचाई पर ले जा सकें।और भीऔर भी