हमारे लिए क्या अच्छा है क्या बुरा, इस पर हम अक्सर दूसरों की राय पर चलते हैं जिससे भ्रांति ही उत्पन्न होती है। हमें अपना फैसला खुद करना होगा। तभी हम सही काम को सही ढंग से कर पाएंगे।और भीऔर भी

योग महज कसरत नहीं, बल्कि कर्म में कुशलता का नाम है। हमारे जीवन का बहुत बड़ा भाग इसलिए व्यर्थ चला जाता है क्योंकि या तो हम गलत काम करते हैं या फिर सही काम को गलत ढंग से करते हैं।और भीऔर भी

यूं तो हर दिन नया जन्म है। फिर खुद अपना जन्म दिन क्या मनाना? हां, दूसरे आपका जन्म दिन मनाएं, तब कोई बात है। वैसे, दूसरों के लिए भी आपका जन्म दिन अपनी खुशियों का बहाना होता है।और भीऔर भी

जिस काम को करने से मन को शांति मिले, जिसे करते हुए मन में शांति हो और जिसे करने के बाद मन में शांति रहे, वही काम हमारे लिए सही काम है। लेकिन काम चुनने की यह आजादी मिले तो सही।और भीऔर भी

अगर कोई व्यक्ति, संस्था या समाज समस्याओं से जूझने के बजाय उनके साथ रहना सीख लेता है तो उसका विकास अवरुद्ध हो जाता है। समस्याएं तो दरवाजे हैं जिन्हें खोलने पर नई राहें निकलती हैं।और भीऔर भी

जीने की चाह में मरे जा रहे हैं। अस्सी साल, नब्बे साल, सौ साल। इत्ता जीकर क्या करोगे बापू? असली सुख तो पाया नहीं! जाना ही नहीं कि हमारे अंदर-बाहर जो भी हो रहा है, वो हो क्यों रहा है असल में।और भीऔर भी

निष्काम कर्म जैसा कुछ नहीं होता। हर काम के पीछे किसी न किसी फल की कामना होती है। काम में छल तब पैदा होता है जब पेड़ लगाने का मकसद फल नहीं, कुछ और होता है। यह समाज की देन है।और भीऔर भी

बच्चा जन्मता है तो आदिम होता है। फिर घर-समाज की उंगली पकड़ लाखों सालों का सफर चंद सालों में पूरा करता है, अनगिनत जन्मों को पार करता है। यह जन्म तो समझदार होने के बाद शुरू होता है।और भीऔर भी

सच तो सच है। हम जानें या न जानें, इससे उस पर फर्क नहीं पड़ता। सच चलायमान है। फिर भी वो खुद चलकर हमारे पास नहीं आता। अनुसंधान करना पड़ता है। तभी हम सच की मणि तक पहुंच पाते हैं।और भीऔर भी

पुराने का अपना चुंबकीय क्षेत्र व गुरुत्व है। नया पुराने के ही भीतर जन्मता है, पनपता नहीं। इसलिए असंतोष को दिल में रखकर पुराने में ही कोई कोना पकड़ लेनेवाले लोग नए का सृजन नहीं कर पाते।और भीऔर भी