भगवान को क्या खोजते हैं! खोजना ही है तो खुद को खोजिए जो इस भवसागर में कहीं खो गया है। अपनी खोज करेंगे तो खुद को पाने पर तर जाएंगे। भगवान को खोजेंगे तो दूसरों के धंधे का शिकार बन जाएंगे।और भीऔर भी

दुनिया को जीने के लिए बेहतर जगह बनाने के संघर्ष में लगे लोग निश्चित रूप से धन्य हैं। लेकिन जो घर को जीने की बेहतर जगह बनाने में लगे है, उनकी इत्ती उपेक्षा क्यों? आखिर आधी दुनिया तो वही हैं!और भीऔर भी

हर दिन देश-दुनिया व समाज में इतना कुछ घटित होता है कि उन्हें जानकर हम एक ही दिन में परम ज्ञानी बन सकते हैं। लेकिन नजर की सीमा और आत्मग्रस्तता के कारण हम बहुत कुछ देख ही नहीं पाते।और भीऔर भी

जिंदगी में तमाम छोटी-छोटी चीजों से हमारा सुख व दुख निर्धारित होता है। इनमें से कुछ का वास्ता हमारे व्यक्तित्व, परिवार व दोस्तों से होता है, जबकि बहुतों का वास्ता सरकार व समाज के तंत्र से होता है।और भीऔर भी

मनोरंजन का काम है कि रोज की रगड़-धगड़ और खरोचों को सम कर दे, संतुलन बना दे। लेकिन हमारे सपने जब रोज यह काम बखूबी कर देते हैं तो अलग से मनोरंजन की क्या जरूरत? हां, ज्ञान जरूरी है।और भीऔर भी

ज्ञान का हर चिप खुशी के नए स्रोत खोलता है। चीजें वही रहती हैं, लेकिन नजरिया बदलने से उनके साथ आपके रिश्ते बदलकर नए बन जाते हैं। खुशी की चादर इन्हीं रिश्तों के तानेबाने से ही बुनी जाती है।और भीऔर भी

प्रतिभा को साहस और बहादुरी का साथ न मिले तो वह कभी खिल ही नहीं सकती। डर-डर कर जीनेवाला दुनियादार हो सकता है, प्रतिभाशाली नहीं। प्रतिभा तो हमेशा लीक से हटकर, खांचे को तोड़कर चलती है।और भीऔर भी

लोगों को खुश करने के फेर में आप वो नहीं कर पाते जो आप में और आप जिसमें रचे-बसे हो। इसलिए वही करें जिसमें आपको आनंद आता है। दिल की बात सुननेवालों से कामयाबी भी ज्यादा दूर नहीं रह पाती।और भीऔर भी

भविष्य की लकीरें दिखतीं नहीं तो लोग हाथों की लकीरों के चक्कर में फंस जाते हैं। लेकिन लकीरों का चक्कर खुद की क्षमता और कर्म की ताकत पर भरोसा घटा देता है और वे लड़ने से पहले ही हार जाते हैं।और भीऔर भी

जब तक हम किसी चीज में डूबे हैं, तभी तक उससे आक्रांत हैं। बाहर निकलते ही लगता है कि इस कदर परेशान होना गलत था। लेकिन सृजन के लिए डूबना ही पड़ता है तो समझ के लिए निकलना भी पड़ता है।और भीऔर भी