राह की तलाश
दुनिया जंगल है और उसकी सारी राहें पत्तों से ढंकी हैं। बड़े होते ही मां-बाप का हाथ छोड़ राह की तलाश में जुट जाते हैं। सच्चा गुरु मिला तो मिल जाती है मंजिल। नहीं तो ताज़िंदगी भटकते रह जाते है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
दुनिया जंगल है और उसकी सारी राहें पत्तों से ढंकी हैं। बड़े होते ही मां-बाप का हाथ छोड़ राह की तलाश में जुट जाते हैं। सच्चा गुरु मिला तो मिल जाती है मंजिल। नहीं तो ताज़िंदगी भटकते रह जाते है।और भीऔर भी
ज़िंदगी में कभी कमजोर, कायर व भीरु लोगों से नाता नहीं बनाना चाहिए। उन पर रहम करो, लेकिन दूर से। पास बैठा लिया तो सिर पर चढ़कर ऐसी चिल्ल-पों मचाएंगे कि आपका चलना ही दूभर हो जाएगा।और भीऔर भी
यह देश गांधी, सुभाष व पटेल का था, तब था। अभी हमारा है। जब हैं, तभी तक है क्योंकि देश तो वह पौध है जो पीढ़ी दर पीढ़ी लहलहाती रहती है। जो अगली पीढ़ी की नहीं सोचता, वह देशभक्त नहीं, भोगी है।और भीऔर भी
सही ज्ञान, विज्ञान और दर्शन के बिना हम इस दुनिया में आंखें रहते हुए भी अंधों की तरह विचरते हैं। अंदाज सही लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का। चोट सिर में लगती है और मरहम घुटनों में लगाते हैं।और भीऔर भी
अतीत से चिपके रहे तो वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते। अतीत को ठुकरा दिया, तब भी वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते क्योंकि अतीत ही हमें अपने कर्मों के सही-गलत होने का भान कराता है।और भीऔर भी
मैं तो बांस का एक टुकड़ा भर हूं, जिसने बाहर से आनेवाली हवाओं के लिए कई झरोखे काट रखे हैं। अगर बहती हवा के झोंके, किसी की सांसों का वेग इसे बांसुरी बना देता है तो इसमें मेरी क्या भूमिका!और भीऔर भी
फिरौती, राजनीति, धर्म और धंधा – चारों में पब्लिक से वसूली की जाती है। फिरौती में फौरी तो राजनीति में स्थाई भय दिखाकर वसूली की जाती है, जबकि धर्म और धंधे में वसूली बड़े प्यार से की जाती है।और भीऔर भी
अपने को जानने का मतलब है अपने शरीर, मन और इस दुनिया-जहान की संरचना को जानना, इनकी मूल प्रकृति व अंतर्संबंधों को समझना। आज आंखें मूंदकर अपने को जानने की कसरत बेमतलब है।और भीऔर भी
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