मन की तसल्ली
अपनी तसल्ली के लिए मन में यही भाव बैठा लेना श्रेयस्कर है कि हम जो भी काम करते हैं, मूलतः अपने लिए करते हैं, दूसरों के लिए नहीं। दूसरा तो बस बहाना है। वह न होता तो हम निठल्ले पड़े रहते।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
अपनी तसल्ली के लिए मन में यही भाव बैठा लेना श्रेयस्कर है कि हम जो भी काम करते हैं, मूलतः अपने लिए करते हैं, दूसरों के लिए नहीं। दूसरा तो बस बहाना है। वह न होता तो हम निठल्ले पड़े रहते।और भीऔर भी
पत्थर में न तो इच्छा होती है और न द्वेष। उसे न सुख होता है, न दुख। न ही पत्थर अपना रूप बनाए रखना चाहता है, जबकि ये अनुभूतियां ही प्राणियों की पहचान और उनके जीवन का मूल तत्व हैं।और भीऔर भी
जहां कुछ करने के लिए कुछ न करनेवालों की मंजूरी लेनी पड़े, जहां बिचौलियों की मौज और रिश्वत का बोलबोला हो, जहां कानून भी उन्हें ही बचाता हो, वैसे तंत्र का नाश आज नहीं तो कल अवश्यसंभावी है।और भीऔर भी
जनता के धन की लूट भ्रष्टाचार है और जनता के धन से सरकार की तिजोरी भरती है जिसे जन-प्रतिनिधि ही लूटते हैं। ऐसे में ये प्रतिनिधि कैसे जनता के सच्चे प्रतिनिधि और ये लूटतंत्र लोकतंत्र कैसे हो सकता है?और भीऔर भी
किसी से मिलते ही हम समानता के बिंदु पहले तलाशने शुरू कर देते हैं। लेकिन समानता से शुरू हुए रिश्ते अंततः तनावग्रस्त हो जाते हैं। वहीं, अगर हम असमानता से शुरू करें तो रिश्ते दीर्घजीवी बनते हैं।और भीऔर भी
जो लोग कर्ज, आग, शत्रु व बीमारी, इन चारों को पूरी तरह खत्म किए बिना चैन से नहीं बैठते, उनको बाद में कभी नहीं रोना पड़ता। लेकिन जो इन्हें लोग पाले रहते हैं, वे ताजिंदगी विलाप ही करते रहते हैं।और भीऔर भी
भावुक होना जरूरी है क्योंकि महज बुद्धि के दम पर हम सच तक नहीं पहुंच सकते। लेकिन बुद्धि को कभी इतनी दूर घास चरने नहीं भेज देना चाहिए कि किसी को हमारी भावनाओं से खेलने का मौका मिल जाए।और भीऔर भी
ज़िंदगी इतनी अनिश्चित नहीं होती, दुनिया इतनी जटिल नहीं होती, लोग इतने कुटिल नहीं होते तो जीने में मज़ा ही क्या रहता! सब कुछ रूटीन, बेजान, एकदम ठंडा!! संघर्ष की ऊष्मा ही तो जीवन है।और भीऔर भी
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