बाधाओं के बुलबुले
पहले ही बाधाओं की सोचने लगे तो बाधाओं के इतने बुलबुले फूट पड़ेंगे कि चलना ही रुक जाएगा। आकस्मिकता का इंतजाम होना चाहिए। विफल हो गए तो क्या करेंगे, इसका भी आभास होना चाहिए। पर, मंजिल तो चलने से ही मिलेगी।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
पहले ही बाधाओं की सोचने लगे तो बाधाओं के इतने बुलबुले फूट पड़ेंगे कि चलना ही रुक जाएगा। आकस्मिकता का इंतजाम होना चाहिए। विफल हो गए तो क्या करेंगे, इसका भी आभास होना चाहिए। पर, मंजिल तो चलने से ही मिलेगी।और भीऔर भी
जब तीन-तीन सत्ताएं आपके भीतर हैं तो बाहरी सत्ता के फेर में क्यों पड़ना! मन ही मन मातृसत्ता, पितृसत्ता और गुरुसत्ता को साध लिया जाए तो आशीर्वाद व प्रेरणा का ऐसा निर्झर अंदर से बहता है कि कहीं और माथा झुकाने की जरूरत नहीं।और भीऔर भी
संघर्ष तो एक ही है घर से लेकर दफ्तर और व्यापक समाज तक। वो यह कि जो मेहनत करते हैं, उन्हें उनका वाजिब श्रेय कैसे दिलाया जाए। घर में महिला को, फैक्टरी में कामगार को, दफ्तर में कर्मचारी को और राजनीतिक पार्टी में कार्यकर्ता को।और भीऔर भी
शरीर है, तभी सब है। घर-परिवार। सुख-समृद्धि। ज्ञान-ध्यान। सबकी शुरुआत इसी से होती है और इसी के साथ इससे जुड़े हर भाव का अंत हो जाता है। बर्तन ही नहीं तो अमृत रखेंगे कहां? इसलिए सबसे पहले शरीर की शुद्धता व पात्रता जरूरी है।और भीऔर भी
हम बहुत सारी चीजों को देखते हुए भी देख नहीं पाते क्योंकि उन्हें हम सरसरी व सामान्य नज़र से देखते हैं। हमें उनकी विशिष्टता का बोध नहीं होता। उसी तरह जैसे सब कुछ समान होते हुए भी घोड़े, कुत्ते और चूहे को अलग-अलग दिखता है।और भीऔर भी
यहां अपने ही इतने उलझाव हैं कि दूसरों के बारे में कैसे सोचें? इसी सोच में अपनी ही नाक देखते रह जाते हैं हम। नहीं समझ पाते कि दूसरों के बारे में सोचने-देखने से हमें ऐसा आईना मिलता है जहां हमारी नजर के तमाम धोखे मिट जाते हैं।और भीऔर भी
विज्ञान का सीधा-सा नियम है कि काम का निर्धारण इससे होता है जो कोई चीज चली कि नहीं। सीढ़ी चढ़कर वहीं उतर आओ तो थक जाने के बावजूद विज्ञान की नज़र में किया गया काम शून्य है। इसलिए सार्थक मेहनत का ही मोल है।और भीऔर भी
चीजें अपने-आप में बड़ी सरल होती हैं। नियमबद्ध तरीके से चलती हैं। बड़ी क्रमबद्धता होती है उनमें। लेकिन हमारी सोच और अहंकार के चलते वे उलझी हुई नज़र आती हैं। सही नज़रिया मिलते ही सारा उलझाव मिट जाता है।और भीऔर भी
चाहने भर से मंज़िलें नहीं मिला करतीं। दुनिया में किसी भी चाह को पूरा करने के लिए सामाजिक तंतुओं को जोड़ना पड़ता है। अगर हम यह जोड़ नहीं हासिल कर पाते तो चाहतें ताजिंदगी कचोट बनकर रह जाती हैं।और भीऔर भी
© 2010-2025 Arthkaam ... {Disclaimer} ... क्योंकि जानकारी ही पैसा है! ... Spreading Financial Freedom