ज़िंदगी में कभी कमजोर, कायर व भीरु लोगों से नाता नहीं बनाना चाहिए। उन पर रहम करो, लेकिन दूर से। पास बैठा लिया तो सिर पर चढ़कर ऐसी चिल्ल-पों मचाएंगे कि आपका चलना ही दूभर हो जाएगा।और भीऔर भी

हम जैसे ही कोई काम शुरू करते है, खटाक से अंदर से आवाज़ आती है – बाद में कर लेंगे। यह जड़त्व है जो चीजों का जैसे का तैसा रहने देना चाहता है। हर कदम पर इसे तोड़कर ही आगे बढ़ना पड़ता है।और भीऔर भी

यह देश गांधी, सुभाष व पटेल का था, तब था। अभी हमारा है। जब हैं, तभी तक है क्योंकि देश तो वह पौध है जो पीढ़ी दर पीढ़ी लहलहाती रहती है। जो अगली पीढ़ी की नहीं सोचता, वह देशभक्त नहीं, भोगी है।और भीऔर भी

सही ज्ञान, विज्ञान और दर्शन के बिना हम इस दुनिया में आंखें रहते हुए भी अंधों की तरह विचरते हैं। अंदाज सही लग गया तो तीर, नहीं तो तुक्का। चोट सिर में लगती है और मरहम घुटनों में लगाते हैं।और भीऔर भी

अतीत से चिपके रहे तो वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते। अतीत को ठुकरा दिया, तब भी वर्तमान को ठीक से नहीं जी सकते क्योंकि अतीत ही हमें अपने कर्मों के सही-गलत होने का भान कराता है।और भीऔर भी

मैं तो बांस का एक टुकड़ा भर हूं, जिसने बाहर से आनेवाली हवाओं के लिए कई झरोखे काट रखे हैं। अगर बहती हवा के झोंके, किसी की सांसों का वेग इसे बांसुरी बना देता है तो इसमें मेरी क्या भूमिका!और भीऔर भी

फिरौती, राजनीति, धर्म और धंधा – चारों में पब्लिक से वसूली की जाती है। फिरौती में फौरी तो राजनीति में स्थाई भय दिखाकर वसूली की जाती है, जबकि धर्म और धंधे में वसूली बड़े प्यार से की जाती है।और भीऔर भी

अपने को जानने का मतलब है अपने शरीर, मन और इस दुनिया-जहान की संरचना को जानना, इनकी मूल प्रकृति व अंतर्संबंधों को समझना। आज आंखें मूंदकर अपने को जानने की कसरत बेमतलब है।और भीऔर भी

परिवार के लिए आप यकीनन मूल्यवान हैं। लेकिन अपना सच्चा सामाजिक मूल्य समझना हो तो बस इतना सोचकर देखें कि आपके बिना यह दुनिया कैसे चलती है और आपके न होने से कितना फर्क पड़ेगा।और भीऔर भी

प्रकृति की संरचनाएं जैसी जटिल हैं, वैसी ही जटिलता हमारे भाव-संसार, विचारों की दुनिया और सामाजिक रिश्तों में भी है। जो इसे नहीं देख पाते या नज़रअंदाज़ करते हैं, वे अक्सर ठोकर खाते रहते हैं।और भीऔर भी