चालबाज का जाल
जो भी मंत्र, तंत्र या वस्तु हमारी बुद्धि व दृष्टि को तेज करती हो, उसका स्वागत है। लेकिन नजर को धुंधला और शक्ति को धूमिल करनेवाली हर चीज त्याज्य है क्योंकि वह किसी चालबाज का फेंका जाल है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
जो भी मंत्र, तंत्र या वस्तु हमारी बुद्धि व दृष्टि को तेज करती हो, उसका स्वागत है। लेकिन नजर को धुंधला और शक्ति को धूमिल करनेवाली हर चीज त्याज्य है क्योंकि वह किसी चालबाज का फेंका जाल है।और भीऔर भी
हम अमूमन यही माने रहते हैं कि हम तो चलते रहे, जबकि दूसरे ठहरे रहे। पर ये कैसे संभव है? एक पांव वर्तमान और दूसरा अतीत में रखकर रिश्ते नहीं चल सकते हैं। उन्हें समय के साथ लाना जरूरी है।और भीऔर भी
बहुत कम लोग हैं जिन पर देश-दुनिया का फर्क पड़ता है। इनमें से भी ज्यादातर लोग भावना में बहकर पूरा सच नहीं देख पाते, गुमराह हो जाते हैं। स्वार्थ में धंसे दुनियादार लोग उन पर हंसते है, तरस खाते हैं।और भीऔर भी
जो चीज सबके हित से जुड़ी हो, जिससे सबका वास्ता हो, उससे जुड़ी बातों को छिपाना गुनाह है। निजी बातों को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। लेकिन सार्वजनिक बातों की परदादारी से भ्रष्टाचार उपजता है।और भीऔर भी
इन दुनिया की खूबसूरती यह है कि यहां किसी की भी तानाशाही शाश्वत नहीं होती। यहां अंततः सामंजस्य और संतुलन ही चलता है। हर अति के अंदर से ही वे तत्व पनपते हैं जो उसका अंत कर देते हैं।और भीऔर भी
इंसान को अपने ही अंदाज में निखरने की ख्वाहिश रखनी चाहिए। दूसरा तो दूसरा ही है। हो सकता है ऊपर से कामयाब दिखता हो और अंदर से खोखला हो। उससे सबक सीखें, लेकिन कभी नकल न करें।और भीऔर भी
भगवान और धर्म की शुरुआत समाज में सुख-शांति के साधन के रूप में हुई थी। सदियों तक सब कुछ राजी-खुशी चलता रहा। समस्या तब से शुरू हुई जब इन्हें साधन के बजाय साध्य बना दिया गया।और भीऔर भी
प्यार नहीं कर सकते तो प्यार का मोल तो समझो। उसकी कद्र तो करना सीखो। दे नहीं सकते तो देनेवाले का सम्मान तो करो। नहीं तो किसी दिन अपनों को तरस जाओगे और कोई पुछत्तर तक नहीं होगा।और भीऔर भी
बीज अगर फलियों की खोल तोड़कर बाहर न निकलें तो सृजन का सिलसिला ही रुक जाए। इसी तरह मानव समाज को आगे बढ़ाने के लिए कुछ लोगों को सुरक्षा का कवच तोड़कर बाहर निकलना ही पड़ता है।और भीऔर भी
वो सभा, सभा नहीं जिसमें गुरुजन न हों। वे गुरुजन, गुरुजन नहीं जिनकी वाणी में सदाचार न हो। वह सदाचार, सदाचार नहीं जिसमें सत्य न हो। वो सत्य, सत्य नहीं जो किसी को कपट के लिए उकसाता हो। और भीऔर भी
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