सरकारी विभागों व कंपनियों को लघु क्षेत्र से न्यूनतम 20% खरीदना होगा

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार को उस सार्वजनिक खरीद नीति को मंजूरी दे दी जिसके तहत केंद्र सरकार के हर मंत्रालय, विभाग व कंपनी को अपनी सालाना जरूरत का कम से कम 20 फीसदी हिस्सा सूक्ष्‍म व लघु उद्यमों (एमएसई) से खरीदना होगा। इसमें माल व सेवाएं दोनों शामिल हैं। इन नीति को सूक्ष्‍म, लघु व मझोले उद्यम विभाग (एमएसएमईडी) अधिनियम, 2006 की धारा 11 के तहत अधिसूचित किया जाएगा।

नई नीति के मुताबिक केंद्र सरकार के इन निकायों को वित्त वर्ष की शुरूआत में ही एमएसई क्षेत्र से खरीद का सालाना लक्ष्‍य इस तरह निर्धारित करना होगा ताकि तीन वर्षों की अवधि में एमएसई क्षेत्र से माल व सेवा की औसत सालाना खरीद कम से कम 20 फीसदी हो। इस तरह शुरुआती तीन सालों में सरकारी निकायों को 20 फीसदी लक्ष्य की पूर्ति में थोड़ी ढील दी गई है। लेकिन तीन सालों के बाद एमएसई से न्‍यूनतम 20 फीसदी खरीद को अनिवार्य कर दिया जाएगा। इस शर्त को पूरा न करनेवाले निकायों को संबंधित समीक्षा समिति के सामने जवाब देना होगा।

नई सार्वजनिक खरीद नीति में यह भी तय हुआ है कि एमएसई के न्यूनतम 20 फीसदी खरीद का 20 फीसदी यानी 1/5वां हिस्सा या दूसरे शब्दों में कुल सालाना खरीद का 4 फीसदी हिस्सा अनुसूचित जाति/जनजाति के उद्यमियों द्वारा चलाई जा रही इकाइयों से लेना होगा। हालांकि निविदा प्रक्रिया में भागीदारी अथवा निविदा शर्तों को पूरा करने में अगर ऐसे एमएसई विफल रहते हैं तो इस 4 फीसदी हिस्से को अन्‍य एमएसई से पूरा किया जा सकता है। लघु व छोटी इकाइयों को निविदा मूल्य में भी रियायत देने का भी प्रावधान है।

रक्षा संबंधी हथियारों के आयात की विशेष स्थिति को देखते हुए ऐसी खरीद को रक्षा मंत्रालय के 20 फीसदी खरीद लक्ष्य से बाहर रखा गया है। इसके अलावा हथियार प्रणाली व मिसाइल जैसे रक्षा उपकरण इस नीति के दायरे से बाहर होंगे। सरकार ने तय किया है कि हर केंद्रीय मंत्रालय, विभाग व सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) एमएसई क्षेत्र से खरीद के संदर्भ में निर्धारित लक्ष्‍यों की रिपोर्ट देंगे और अपनी सालाना रिपोर्टों में इससे जुड़ी उपलब्धियों को शामिल करेंगे।

बता दें कि इस समय 358 आरक्षित सामान सूक्ष्‍म और लघु उद्यमों से ही खरीदे जा सकते हैं। नीति में यह प्रावधान बनाए रखा गया है। लेकिन इस सूची की निरंतर समीक्षा और एमएसई क्षेत्र से सार्वजनिक खरीद नीति की निगरानी और मूल्‍यांकन के लिए सूक्ष्‍म, लघु व मझोले उपक्रम (एमएसएमई) मंत्रालय के सचिव की अध्‍यक्षता में एक समिति गठित की गई है। इसके अलावा सरकारी खरीद में एमएसई क्षेत्र के उद्यमियों की शिकायतों के निपटारे के लिए मंत्रालय ‘शिकायत प्रकोष्‍ठ’ भी स्‍थापित करेगा।

असल में सरकार ने माना है कि खादी, ग्रामोद्योग व कॉयर उद्योग समेत एमएसई क्षेत्र देश के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) से लेकर मैन्यूफैक्चरिंग व निर्यात तक में महत्‍वपूर्ण योगदान देता है। रोजगार सृजन में भी इनकी अहम भूमिका है। सरकार ने इस क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए उत्‍पादों के आरक्षण, निःशुल्‍क निविदा, धरोहर राशि के भुगतान में छूट जैसी तमाम सुविधाएं दे रखी हैं। लेकिन व्‍यवहार में इन पर अमल नहीं हो रहा है। इसीलिए अब बाकायदा कानून में बदलाव लाकर सार्वजनिक खरीद की अलग नीति लागू की जा रही है।

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