सब मिला भाव में तो खेलो भाव पर
फाइनेंस की दुनिया ज्यादा अस्थिर, ज्यादा रिस्की हो चली है। ग्लोबल हरकतें लोकल खबरें बन गई हैं। नेट व चौबीसों घंटे चलते न्यूज़ चैनलों ने सूचनाओं को सर्वसुलभ करा दिया। पर प्रोफेशनल फंड मैनेजर सूचनाओं के आम होने से पहले ही उनका खास इस्तेमाल कर लेते हैं। खबर हम तक पहुंचे, इससे पहले वे उसका रस निकाल लेते है। लेकिन सारी हरकतें जाती हैं भाव में। इसलिए भाव को पकड़ो, भाव पर खेलो। अब देखें बाज़ार मंगल का…औरऔर भी
गारंटी नहीं, ये खेल प्रायिकताओं का
पहले नौकरी। फिर जूस की दुकान। अब ट्रेडिंग का जुनून सवार है। सारी पोथियां बांच डालीं। चार्ट पर इतने सारे इंडीकेटर चिपकाए कि माथा झन्ना गया। अरे भाई! इतना उलझाव क्यों? जीवन में कठिनतम सवालों के जवाब बड़े आसान हुआ करते हैं। बाज़ार कैसे काम करता है, आगे क्या होनेवाला है, आप सही-सही कभी नहीं जान पाएंगे। ट्रेडिंग में कूदने से पहले इसे गांठ बांध लें। यह गारंटी नहीं, प्रायिकताओं का खेल है। अब रुख सोमवार का…औरऔर भी
बुलबुला फट भी जाए, कोई फर्क नहीं!
मशहूर विश्लेषक मार्क फेबर का मानना है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय साल 2008 से भी बदतर अवस्था में है। जबरन कम रखी ब्याज दरों का विस्तार अमेरिका से लेकर यूरोप तक हो चुका है। हर महीने 85 अरब डॉलर के नोट झोंकने के बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था संतोषजनक स्थिति में नहीं आ पाई है। भारत व चीन जैसे उभरते देश भी सुस्त पड़ते दिख रहे हैं। ऐसे माहौल में ऐसी कंपनी, जिसका आधार बड़ा मजबूत है…औरऔर भी
रिश्ते तो वही, पर समीकरण भिन्न हैं
हम ज़मीन को छोड़े बगैर आसमान में उड़ना चाहते हैं! कार चलाना आ गया तो मान बैठते हैं कि हवाई जहाज़ भी उड़ा लेंगे। सोने व रीयल एस्टेट को जान लिया तो सोचते हैं कि शेयर बाज़ार और फॉरेक्स बाज़ार पर भी सिक्का जमा लेगे। यह संभव नहीं है क्योंकि भौतिक अर्थव्यवस्था और फाइनेंस की अर्थव्यवस्था में सचमुच ज़मीन आसमान का अंतर है। डिमांड, सप्लाई और दाम का रिश्ता यहां भी है और वहां भी। लेकिन समीकरणऔरऔर भी
बाज़ार अपना, दबदबा विदेशियों का
भारतीय शेयर बाज़ार के रोज़ के औसत टर्नओवर में 2001 से 2013 तक के 12 सालों में आम भारतीय निवेशकों की भागीदारी 89.46% से घटकर 34.31% पर आ चुकी है, जबकि विदेशी निवेशकों का हिस्सा 7.95% से 47.25% पर पहुंच गया। इसी दौरान घरेलू संस्थाओं की भागीदारी 2.59% से 18.44% हो गई। विदेशियों के धन पर यूं बढ़ती निर्भरता देश की सेहत के लिए कतई अच्छी नहीं। आप सोचें इस मुद्दे पर। चलें अब शुक्र की ओर…औरऔर भी





