बंद भाव बड़ा महत्वपूर्ण है। तमाम विश्लेषणों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शेयर के बंद भाव दिन के आखिरी भाव नहीं होते। दरअसल तीन से साढ़े तीन बजे तक जितने भी सौदे होते हैं, उनके भारित औसत से बंद भाव निकलता है। आप खुद एनएसई की वेबसाइट पर जाकर तस्दीक कर सकते हैं कि किस तरह बंद भाव अलग होता है और आखिरी भाव अलग। अब शुरुआत नए सप्ताह की…औरऔर भी

कोई भी शेयर अपनी सहूलियत से खरीदें, न कि दूसरों के दबाव और बाजार के शोरशराबे पर। वो भी तब, जब भाव अपने माफिक आ जाए। सौ-पचास स्टॉक्स खरीदने की जरूरत नहीं। आठ-दस साल में दौलत पैदा करने के लिए पांच-दस स्टॉक्स ही काफी हैं। तथास्तु में आज एक ऐसी कंपनी जो पिछले 15 सालों से अपने मुनाफे का 3/4 हिस्सा शेयरधारकों में बांटती रही है। इसका शेयर अभी महंगा है। थोड़ा नीचे आए तभी खरीदना है…औरऔर भी

अल्गोरिदम ट्रेडिंग या हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग का नाम आपने सुना ही होगा। जानते भी होंगे कि इसमें ट्रेडिंग का सारा काम कंप्यूटर सॉफ्टवेयर करते हैं। करोड़ों का दांव खेलनेवाली संस्थाएं इस तरह की ट्रेडिंग का सहारा लेती है। हमें पांच-दस फीसदी की कमाई चाहिए होती है, जबकि अल्गो ट्रेडिंग में पांच-दस पैसे का लाभ एक-एक दिन में लाखों की कमाई करा देता है। सवाल उठता है कि क्या इस हाई फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग का मुकाबला हम जैसे आमऔरऔर भी

सेंसेक्स तीन साल बाद फिर 21,000 को लांघ गया। लेकिन तब यह चौबीस के पी/ई अनुपात पर ट्रेड हो रहा था, अभी अठ्ठारह पर। तब बुक वैल्यू से चार गुना था, अभी 2.8 गुना। क्या अभी बाज़ार के और उठने की गुंजाइश है? देखेंगे, तब की तब। गंभीर मसला यह है कि तब बाज़ार के टर्नओवर में रिटेल निवेशकों की भागीदारी लगभग आधी थी। अभी एक-तिहाई है। संस्थागत निवेशक हावी हैं बाज़ार पर। फिर, कैसे निकालें राह…औरऔर भी

आपने देखा होगा कि दो-ढाई बजे निफ्टी में अचानक तेज़ मोड़ आता है। दरअसल यह बड़े निवेशकों, खासकर संस्थाओं का खेल है। वे निफ्टी के चुनिंदा दो-तीन शेयर बड़ी मात्रा में खरीदते/बेचते हैं। निफ्टी खटाक से दिशा बदलता है। वे उसी समय कॉल व पुट ऑप्शन के सौदे करते हैं। बहुतों का स्टॉप-लॉस ट्रिगर हो जाता है। पर संस्थाएं थोड़ी ही देर में जमकर कमा लेती हैं। बाज़ार में चलती हैं ऐसी कारस्तानियां। अब ट्रेडिंग गुरु की…औरऔर भी