सोच में बुनियादी खोट हो तो वह हर तरफ रायता फैला देती है। मानव मनोविज्ञान से शेयरों की खरीद-फरोख्त प्रभावित होती है। लेकिन इस सोच को इतना खींच ले जाना कि चांद तेल व गैस, गुरु और शनि मेटल और सूर्य फार्मा शेयरों के भाव तय करता है, यकीनन किसी और का शिकार बनना है। अरे! भाव कोई भगवान या ग्रह-नक्षत्र नहीं चलाते। इसे लोग उठाते/गिराते हैं। ग्रहों की चाल नहीं, उनका मन समझिए। अब असली बात…औरऔर भी

दुनिया में आज से नहीं, सदियों से थोथा बहुत और सार कम है। कबीरदास की सीख थी कि सार-सार को गहि रहय, थोथा देय उड़ाय। फाइनेंस व ट्रेडिंग में भी 90% शोर और 10% सार होता है। अगर हम चार्ट देखकर बाज़ार में खरीदने और बेचनेवालों के सही संतुलन को समझना चाहते हैं तो शोर को दरकिनार कर सार को पकड़ना होगा, जिस तक पहुंचने का सबसे शानदार सॉफ्टवेयर है हमारी बुद्धि। अब पकड़ें आज का बाज़ार…औरऔर भी

जब देश के भीतर और देश के बाहर अनिश्चितता का माहौल कुछ ज्यादा ही गहरा हो चला हो, तब हमें उन्हीं कंपनियों में निवेश करना चाहिए जो तगड़ी होड़ में भी सीना तानकर खड़ी ही नहीं, लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे माहौल में कमज़ोर पर दांव लगाना अपनी बचत को जान-बूझकर चक्रवात में फंसाने जैसा है। हमें तो वही कंपनी चुननी चाहिए, मजबूत होते हुए भी जिसका दाम गिरा हुआ है। तथास्तु में ऐसी ही एक कंपनी…औरऔर भी

हम हिंदुस्तानी जुगाड़ तंत्र में बहुत उस्ताद हैं। फाइनेंस और शेयर बाज़ार दुनिया में उद्योगीकरण में मदद और उसके फल में सबकी भागीदारी के लिए विकसित हुए। लेकिन हमने उसे भोलेभाले अनजान लोगों को लूटने का ज़रिया बना लिया। इसलिए शेयर बाज़ार की ठगनेवाली छवि हवा से नहीं बनी है। पिछले हफ्ते हमारे एक सुधी पाठक के एस गुप्ता जी ने एक किस्सा लिख भेजा कि शेयर बाज़ार में पैसा कैसे डूबता है। वो किस्सा यूं है…औरऔर भी

दिसंबर महीने के दूसरे पखवाड़े में आम लोगों के लिए ऐसे सरकारी बांड जारी कर दिए जाएंगे जिसमें बचत को महंगाई की मार से सुरक्षित रखा जा सकता है। इन बांडों का नाम है इनफ्लेशन इंडेक्स्ड नेशनल सेविंग्स सिक्यूरिटीज – क्यूमुलेटिव (आईआईएसएस-सी)। इन्हें रिजर्व बैंक केंद्र सरकार से सलाह-मशविरे के बाद लांच कर रहा है। शुक्रवार को रिजर्व बैंक ने आधिकारिक जानकारी दी कि इन्हें दिसंबर माह के दूसरे हिस्से में पेश कर दिया जाएगा। बता देंऔरऔर भी

दो पाटों के बीच फंसा है अपना शेयर बाज़ार। आज शाम आंकड़ा आएगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में कितनी बढ़ी है। उम्मीद से ज्यादा तो शेयर बाजार चहक उठेगा। वहीं अमेरिकी अर्थव्यवस्था अगर उम्मीद से ज्यादा बढ़ गई तो हमारा शेयर बाज़ार सहम जाएगा क्योंकि इससे यहां सस्ते धन का आना थम सकता है। आर्थिक बढ़त के दो अलग असर। कुछ यूं ही चले है शेयर बाज़ार। अब हफ्ते की आखिरी ट्रेडिंग…औरऔर भी