पानी हमेशा नीचे भागता है तो इंसान ज्यादा फायदे की तरफ भागता है। इसीलिए नए से नया ट्रेडर भी ऑप्शंस व फ्यूचर्स में ही हाथ आजमाना चाहता है, वो भी निफ्टी के इन डेरिवेटिव्स में। मोटामोटी समझ लें कि भविष्य की अनिश्चितता को नांथने के लिए कंपनियां या व्यवसायी डेरिवेटिव्स से हेजिंग करते हैं। पर उनका रिस्क संभालते हैं ट्रेडर या सटोरिए। उनके रिस्क का सारा बोझ हम उठाते हैं। अब करते हैं नए हफ्ते का आगाज़…औरऔर भी

जो सहज हो, वो सही हो, यह जरूरी नहीं। मसलन, इस समय सहज सोच यही है कि खरीदो। हम नहीं समझते कि इससे पीछे सारा खेल लालच का है। आज या कभी भी चढ़े हुए बाज़ार में सही चीज़ होनी चाहिए कि बेचकर पिछला घाटा बराबर कर लो; जो शेयर लक्ष्य पर पहुंच गए हों, उनसे धन निकालकर सुरक्षित माध्यमों में लगा दिया जाए। सहज और सही के समीकरण के बीच तथास्तु में आज की संभावनामय कंपनी…औरऔर भी

जिसे बेचना है, चमत्कारी छवि बनानी है वो अतिविश्वास दिखाएगा। डंके की चोट पर कहेगा कि फलांना शेयर ले लो, इतने तक जाएगा। अरे भाई/बेन! ये तो बता कि इतने तक जाएगा क्यूं? वो कहेगा कि मैं कह रहा/रही हूं, बस इतना ही काफी है। बेचना है तो हांकना उसकी मजबूरी है। लेकिन हम झांसे में आ गए तो यह हमारा बंटाधार करनेवाली कमज़ोरी है। ट्रेडिंग में अतिविश्वास हमें कहीं का नहीं छोड़ता। अब शुक्रवार की अंतर्दृष्टि…औरऔर भी

सच को सही-सही देख लिया तो समझिए कि किला फतेह। इसीलिए ट्रेडिंग के तमाम गुरु बताते हैं कि सफलता में 95% योगदान होमवर्क और 5% ही अमल का होता है। असली चुनौती सच को सही-सही देखने की है। हमारी पूर्व धारणाएं और भावनाएं हमें सच देखने नहीं देतीं। हम मनमाफिक फॉर्मेशन भावों के चार्ट पर ढूंढ निकालते हैं। बाज़ी फिसल जाती है तो हाथ मलते हैं। अभी तो बनाते हैं ऐतिहासिक शिखर पर पहुंचे बाज़ार में रणनीति…औरऔर भी

दूसरे शहरों का पता नहीं। लेकिन मुंबई में तमाम फाइनेंसर महीने में 2% से 5% ब्याज पर उधार देते हैं। इस तरह 24% से 60% तक सालाना ब्याज कमाकर गदगद रहते हैं। इसलिए अगर आप ट्रेडिंग से महीने में 15% तक बराबर कमा लेते हैं तो आप जीनियस हैं। यहां ‘बराबर’ शब्द पर ध्यान दीजिए। अठ्ठे-कठ्ठे तो कोई भी कमा सकता है। मुद्दा है नियमित कमाई का। हवाई नहीं, सच्ची कमाई की सोचिए। अब अभ्यास बुध का…औरऔर भी