असली सवाल यह कि बाज़ार में बड़ों की चाल को पकड़े कैसे? जो लोग कानाफूंसी करते हैं कि एफआईआई, एलआईसी या कोई तोप-तमंचा फलानां स्टॉक खरीद रहा है तो या तो वे झूठ बोलते हैं या कुछ ऑपरेटरों के गुर्गे होते हैं। बड़ों की चाल हम चार्ट पर बखूबी पकड़ सकते हैं। वे तभी निवेश करते हैं जब कोई शेयर दिशा बदलनेवाला होता है, गिरकर उठने या उठकर गिरने जा रहा होता है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

हम बराबर देखते हैं कि बाज़ार की अंतिम चाल देशी-विदेशी संस्थाएं तय करती हैं। वहीं, छोटे व मध्यम दर्जे के स्टॉक्स ऑपरेटर या झुनझुनवाला टाइप उस्ताद लोग उठाते-गिराते हैं। दशकों से हम देख रहे हैं कि बाज़ार को कभी हर्षद मेहता तो कभी केतन पारेख जैसे लोग उंगलियों पर नचाते रहे हैं। बाज़ार हमेशा बड़ों के इशारे पर चलता है। फिर भी हम गफलत में रहते हैं कि बाज़ार हमारे हिसाब से चलेगा। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बाज़ार अगर इंसान होता तो निरा पागल होता। इसके साथ कुछ असाध्य मानसिक समस्याएं हैं। कभी भयंकर उछलकूद मचाता है और शेयरों के भाव सातवें आसमान पर पहुंच जाते हैं तो कभी निराशा में ऐसा डूबता है कि लाख कोशिशों के बावजूद उठने का नाम नहीं देता। सरकार भी उसके आगे थक जाती है। वित्तीय बाज़ार हम जैसे लोगों से ही बनता है, लेकिन उसका सामूहिक व्यक्तित्व तर्कों से परे चला जाता है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

13-14 साल पहले तक कंपनियों के आईपीओ नहीं, पब्लिक इश्यू आया करते थे। तब कंट्रोलर ऑफ कैपिटल इश्यूज़ शेयरों का इश्यू मूल्य तय किया करता था जो अमूमन कम होते थे और आम निवेशक पब्लिक इश्यू से अच्छा कमाते थे। अब तो आईपीओ वेंचर कैपिटल या प्राइवेट इक्विटी फंडों के निकलने का ज़रिया बन गए हैं तो भाव पहले से चढ़े होते हैं। इसलिए हमें आईपीओ से दूर ही रहना चाहिए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी