दुनिया में कोई ट्रेडिंग रणनीति नहीं जो हर हाल में कामयाब हो। अच्छी से अच्छी रणनीति भी कुल मिलाकर 60% सफल और 40% विफल होती है। इसलिए माहौल को देखकर रणनीति को बदलते रहना होता है। फिलहाल निराशा का घटाटोप छा रहा है तो लांग के बजाय शॉर्ट करने की नीति सही रहेगी। लेकिन शॉर्ट सौदे आसान नहीं है क्योंकि इन्हें एफ एंड ओ सेगमेंट में ही किया जा सकता है। अब पकड़ते हैं गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

रिजर्व बैंक ने ब्याज दर में अपेक्षित कटौती कर दी। फिर भी शेयर बाज़ार चहकने के बजाय लुढ़क गया। निफ्टी 2.34% और सेंसेक्स 2.37% गिर गया। कारण बताया जा रहा है कि रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के आर्थिक विकास का अनुमान 7.8% से घटाकर 7.6% कर दिया है। दूसरे, मौसम विभाग का बयान आया कि मानसून इस बार औसत का 93% नहीं, बल्कि 88% रह सकता है। आशा पर निराशा भारी। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

सनफार्मा के नतीजों पर रैनबैक्सी के विलय का बोझ पड़ना ही था तो नतीजों में कमज़ोरी स्वाभाविक थी। ऐसे में ट्रेडरों व निवेशकों में दो तरह की सोच चली। एक, कंपनी दो-तीन तिमाहियों बाद तेज़ी से बढ़ेगी। दूसरी यह कि विलय उस पर भारी पड़ेगा। दूसरी सोच बाज़ार में हावी हो गई तो उसका शेयर छह सालों की सबसे ज्यादा गिरावट का शिकार हो गया। यहीं पर स्टॉप-लॉस का अनुशासन काम आता है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

बहुत ही कम होता है कि विदेशी और देशी संस्थाएं एक ही दिशा में सौदे करें। अमूमन विदेशी बेचते हैं तो देशी खरीदते हैं और विदेशी खरीदते हैं तो देशी बेचते हैं। दोनों महारथी! फिर आखिर सही कौन? यकीनन बाज़ार की दिशा विदेशी संस्थाएं तय करती हैं। लेकिन गिरने पर खरीद और उठने पर बिक्री से मुनाफा कमाने का काम देशी संस्थाएं करती हैं, खासकर एलआईसी। म्यूचुअल फंड तो फिसड्डी हैं। अब परखते हैं सोमवार का व्योम…औरऔर भी

स्मॉल-कैप कंपनियों के शेयर जमकर उछलते हैं तो गिरते भी हैं उतनी ही तेज़ी से। वहीं, मिड-कैप कंपनियों के साथ भी कमोबेश यही होता है। लेकिन मजबूत लार्ज-कैप कंपनियां अगर सही भाव पर पकड़ ली जाएं तो उनमें धीमी ही सही, मगर निरतंर वृद्धि होती रहती है। आज तथास्तु में ऐसी ही एक लार्ज-कैप कंपनी जिसके शेयर बीते तीन महीनों में 21% गिर चुके हैं। अभी इसमें निवेश करना लंबे समय में काफी लाभकारी साबित होगा।…और भीऔर भी