बाज़ार अगर इंसान होता तो निरा पागल होता। इसके साथ कुछ असाध्य मानसिक समस्याएं हैं। कभी भयंकर उछलकूद मचाता है और शेयरों के भाव सातवें आसमान पर पहुंच जाते हैं तो कभी निराशा में ऐसा डूबता है कि लाख कोशिशों के बावजूद उठने का नाम नहीं देता। सरकार भी उसके आगे थक जाती है। वित्तीय बाज़ार हम जैसे लोगों से ही बनता है, लेकिन उसका सामूहिक व्यक्तित्व तर्कों से परे चला जाता है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

13-14 साल पहले तक कंपनियों के आईपीओ नहीं, पब्लिक इश्यू आया करते थे। तब कंट्रोलर ऑफ कैपिटल इश्यूज़ शेयरों का इश्यू मूल्य तय किया करता था जो अमूमन कम होते थे और आम निवेशक पब्लिक इश्यू से अच्छा कमाते थे। अब तो आईपीओ वेंचर कैपिटल या प्राइवेट इक्विटी फंडों के निकलने का ज़रिया बन गए हैं तो भाव पहले से चढ़े होते हैं। इसलिए हमें आईपीओ से दूर ही रहना चाहिए। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

सप्ताह के आखिरी दिन, ट्रेडिंग का सबसे पहला बुनियादी नियम। ट्रेडिंग जितनी और जैसी करें, लेकिन अपनी ट्रेडिंग पूंजी को कतई आंच न आने दें। वो सलामत रहेगी तभी आपकी ट्रेडिंग चल पाएगी। और, उसे सलामत रखना एकदम आपके हाथ में है। किसी एक सौदे में 2% और पूरे महीने में 6% से ज्यादा नुकसान कभी न होने दें। इस सीमा तक पहुंचते ही उस महीने की ट्रेडिंग फौरन रोक दें। अब करते हैं शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

ट्रेडिंग के सदमे से बचने का एक आजमाया हुआ तरीका यह है कि जैसे ही आप बाज़ार से मुनाफा कमाना शुरू कर दें, धीरे-धीरे अपना शुरुआती निवेश निकालकर किनारे रख दें। आगे की ट्रेडिंग बचे हुए मुनाफे से ही करें। इससे एक तो यह होगा कि आपकी बचत सुरक्षित रहेगी। दूसरा फायदा यह होगा कि घाटा लगने पर भी आप को मानसिक झटका नहीं लगेगा और आप बिना घबराए संतुलित फैसला ले पाएंगे। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

ट्रेडिंग के खतरे या रिस्क को न्यूनतम करने का दूसरा तरीका यह है कि कभी अपना पूरा ट्रेडिंग पोर्टफोलियो एक ट्रेड में न लगाएं। आम मानसिकता फटाफट मुनाफा बटोरने की होती है। लेकिन ध्यान रखें हड़बड़ी शैतान का काम है। अपना निवेश बराबर-बराबर महीने में 20 दिन के ट्रेड में बांट दें। इसे पोजिशन साइज़िंग भी कहते हैं। इससे आप ट्रेडिंग के रिस्क को कम और रिटर्न को अधिकतम कर सकते हैं। अब आजमाएं बुध की बुद्धि…औरऔर भी