वैधानिक व्यवस्था बदली, तिजोरी खुली!
प्रधानमंत्री के पद पर बैठे नरेंद्र मोदी की निगाहें रिजर्व बैंक के खज़ाने पर गड़ गईं। लेकिन उस पर हाथ साफ करना आसान नहीं था क्योंकि तब तक की वैधानिक व्यवस्थाएं इसकी इजाज़त नहीं देती थीं। उसी तरह जैसे परशुराम के उंगली दिखाने पर लक्ष्मण पलटकर कहते हैं, “इहां कुम्हड़ बतिया कोउ नाहीं, जे तर्जनी देखि मरे जाहीं।” इससे पार पाने के लिए मोदी सरकार ने दिसंबर 2018 में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान कीऔरऔर भी
रिजर्व बैंक से 9.29 लाख करोड़ उगाही
देश में धन के धमनी-तंत्र भारतीय रिजर्व बैंक के खजाने पर मोदी सरकार की वक्री दृष्टि साल 2018 के मध्य में तब पड़ी, जब उसके पहले कार्यकाल के चार साल बीत चुके थे। तब रिजर्व बैंक के गवर्नर लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के ग्रेजुएट और ऑक्सफोर्ड से लेकर येल यूनिर्विसिटी से एम.फिल व डॉक्टरेट करनेवाले कुशल अर्थशास्त्री ऊर्जित पटेल थे। ऊर्जित पटेल ने नोटबंदी का भी विरोध किया था। लेकिन उनकी एक न चली। 14 सितंबर 2018औरऔर भी
धन उगाही में मोदी सरकार सबकी बाप
एक बात में मोदी सरकार को कोई भी मात नहीं दे सकता, न भूतो न भविष्यति। वो है धन की उगाही। उसने 146 करोड़ देशवासियों में से किसी को नहीं छोड़ा। जीएसटी लगाकर नवजात बच्चे से लेकर मरनेवाले तक से टैक्स वसूलने की व्यवस्था कर ली। वो अपनी धन उगाही में कोई खलल नहीं चाहती। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चा तेल जब भी सस्ता हुआ, उसने एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाकर अपना खजाना भर लिया और आम ग्राहकों तक इसकाऔरऔर भी
इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार
निवेश हमारे आर्थिक व वित्तीय जीवन में छाई अनिश्चितता से लड़ने का साधन है। जिस तरह युद्ध जीतने के लिए सेना बनाकर चला जाता है, जिसमें थल, वायु व नौसेना की अलग-अलग भूमिका होती है, उसी तरह निवेश में सफलता के लिए पोर्टफोलियो बनाकर चलना पड़ता है। कुछ धन सोने में, कुछ एफडी व पीपीएफ जैसे स्थाई आय के माध्यमों में, कुछ हिस्सा ज़मीन-जायदाद में और कुछ हिस्सा शेयर बाज़ार में। शेयर बाज़ार में भी कुछ कंपनियांऔरऔर भी






