देश की आबादी अभी 132.68 करोड़ है, जबकि शेयर बाज़ार में पंजीकृत निवेशकों की संख्या 3.19 करोड़ है। यानी, 2.4% भारतीय ही शेयरों में निवेश करते हैं। शहरों के गली-मोहल्लों में जिस तरह गरीब से गरीब लोग लॉटरी खेलते दिखते हैं, उससे लगता है कि लॉटरी खेलने वालों की संख्या दस करोड़ तो होगी ही। ध्यान दें कि लॉटरी भविष्य से खिलवाड़ है, जबकि शेयरों में हम भविष्य से खेलते हैं। अब तथास्तु में आज की कंपनी…औरऔर भी

स्ट्राइक रेट के बजाय हमें रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात को तवज्जो देनी चाहिए। मान लीजिए कि कोई ट्रेडिंग सेवा 3:1 का रिस्क-रिवॉर्ड अनुपात लेकर चलती है, यानी वो ऐसे स्टॉक्स चुनती है जो बढ़े तो 6% बढ़ सकते हैं और गिरे तो 2% पर निकल जाना होगा। दस में से ऐसे छह सौदे गलत निकले तो घाटा 12% होगा, जबकि बाकी चार सही सौदे 24% देकर जाएंगे। यानी, 40% स्ट्राइक रेट पर भी 12% फायदा। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

जब भी हम ट्रेडिंग की कोई सेवा लेते हैं तो पहला सवाल यही पूछते हैं कि उसके सही होने की दर या स्ट्राइक रेट क्या है। लेकिन किसी समझदार ट्रेडर के लिए यह सवाल एकदम बेमानी है। दरअसल, यह ब्रोकरेज फर्मों के एनालिस्टों का मानदंड है क्योंकि इससे वे अपने को तीसमार-खां साबित करते हैं। इसके लिए वे घाटेवाले ट्रेड को लंबा खींचते और मुनाफेवाले ट्रेड को बीच में ही काट देते हैं। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

पांच बार सिक्का उछालने पर टेल निकला तो हमें लगता है कि छठीं बार हेड आना पक्का है। हमें अहसास नहीं कि हेड या टेल आने की प्रायिकता हमेशा 50% ही रहेगी, भले ही हज़ार क्या, लाख बार सिक्का उछाल लें। सहजबोध की यही गलती हम ट्रेडिंग में करते हैं। कई बार स्टॉस-लॉस लगता जाए तो मान बैठते हैं कि अगली बार फायदा ही होगा। यह कतई यथार्थपरक और तर्कसंगत सोच नहीं है। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी