वित्तीय बाज़ार किसी नियम का गुलाम नहीं। कब कौन-सी दिशा पकड़ लेगा, पक्का बता पाना असंभव है। वो किसी एक इंसान की मर्जी से नहीं, बल्कि लाखों या करोड़ों लोगों के मन व गणनाओं से चलता है। इनसे बनती है उसकी सामूहिक इच्छा जो रैंडम या यदृच्छया चलती है। ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से अलग होने, अमेरिका में ट्रम्प की जीत और अपने यहां की नोटबंदी के लेकर कुछ ऐसा ही हुआ है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार की ट्रेडिंग में उतरे हैं तो बार-बार खुद को चुटकी काटकर याद दिलाते रहना चाहिए कि हम धन के सबसे रिस्की ज़ोन में प्रवेश कर रहे हैं। घटनाएं बारम्बार हमें इस बात का अहसास कराती रहती हैं। लेकिन हम आसानी से उनके सबक भूल जाया करते हैं। किसको याद है कि 2009 में यूपीए सरकार की जीत के बाद भारतीय शेयर बाज़ार एक ही दिन में 17 प्रतिशत चढ़ गया था। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

शेयर बाज़ार समेत समूचे वित्तीय बाज़ार की ट्रेडिंग में कोई हारता है, तभी कोई जीतता है। कुछ लोगों का धन निकलकर दूसरों के पास जाता है। एक का नुकसान, दूसरे का फायदा होता है। हमें कोशिश यही करनी होती है कि हम हारने या गंवानेवाले खेमे में न रहे। लेकिन जब आकस्मिकताओं या बाज़ार के अपने स्वभाव के चलते भयंकर गिरावट का आलम हो, तब हमें क्या करना चाहिए? जबाव बेहद आसान है। अब मंगल की दृष्टि…औरऔर भी

दो महीने पहले 7 सितंबर को 52 हफ्तों का शिखर छूनेवाला निफ्टी अब तक 7.5% गिर चुका है। संभव है कि दिसंबर में अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने से यह और गिर जाए। लेकिन इसी दौरान मजबूत शेयर कुलाचें मार रहे हैं। हम आज तथास्तु में जो कंपनी उठा रहे हैं, उसका शेयर जून में 60 के आसपास था। अभी 300 रुपए के करीब है। बाज़ार में सतह के नीचे की इन अंतर्धाराओं को पकड़ना ज़रूरी है।औरऔर भी