नोटबंदी को लागू हुए चालीस दिन बीत गए। प्रधानमंत्री मोदी का दावा है कि पचास दिन में सब ठीक हो जाएगा। फिलहाल लोगों में सर्कुलेट हो रहे 500 और 1000 रुपए के करीब-करीब सारे पुराने नोट बैंकों में वापस आ चुके हैं। बचे-खुचे अगले दस दिन में आ जाएंगे। लेकिन उन नोटों की भरपाई नहीं हुई। इसलिए जगह-जगह से उपद्रव की खबरें आने लगी हैं। फिर भी ट्रेडर के लिए मौके कम नहीं। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

दो-चार दिन, चंद हफ्तों या महीनों में शेयरों के भाव डर व लालच से तय होते हैं। इसलिए ट्रेडिंग करनेवालों को इन दो भावनाओं की गहरी समझ हासिल करनी पड़ती है। वहीं, दो-चार या दस-पंद्रह साल में शेयरों के भाव संबंधित कंपनियों के बिजनेस से तय होते हैं। निवेश व ट्रेडिंग की बारीकियां अलग हैं। दोनों में कंपनियां चुनने के आधार अलग हैं। आज तथास्तु में ऐसी कंपनी जिसका अतीत, वर्तमान व भविष्य, तीनों दमदार दिखते हैं…औरऔर भी

स्टैंडर्ड डेविएशन की गणना में फंसने के बजाय हम शेयरों के भाव के रोजाना या साप्ताहिक चार्ट पर गौर कर लें तो उसका उतार-चढ़ाव हमें साफ दिख जाता है। ट्रेडिंग के लिए वे शेयर ही सबसे सही होते हैं जिनमें उतार-चढ़ाव ठीकठाक रहता है। मंथर गति से सीमित रेंज में चलते शेयरों में ट्रेडिंग से कमाना बहुत मुश्किल होता है। इसीलिए अक्सर निवेश और ट्रेडिंग के लिए मुफीद शेयर अलग-अलग होते हैं। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

सवाल यह है कि निवेश या ट्रेडिंग से जुड़े रिस्क की गणना कैसे करें? पहली बात यह कि यह रिस्क लॉटरी या पोकर खेलने से एकदम भिन्न है। यहां बिजनेस में लगी एक कंपनी है जिसके शेयर का भाव अंततः उसके धंधे की सेहत से निर्धारित होता है। वो अपने अंतर्निहित मूल्य से निश्चित रेंज में ऊपर-नीचे होता है। इसे उसकी चंचलता या वोलैटिलिटी कहते हैं जिसे स्टैंडर्ड डेविएशन से नापा जाता है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

शेयर बाज़ार में निवेश या ट्रेडिंग करते वक्त हमें अनिश्चितता के तत्व को बराबर याद रखना चाहिए। इसलिए इसमें वही धन लगाना चाहिए जो डूब भी जाए तो हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी पर कोई असर न पड़े। शायद यही समझ है जिसकी वजह से मध्यवर्ग के आम लोग शेयर बाज़ार से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। लेकिन दिमाग का सही इस्तेमाल करें तो सुविचारित रिस्क लेने में कोई हर्ज नहीं। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी