हमारे गृह मंत्री अमित शाह हवा-हवाई प्रचार के गुब्बारे में छेद करने में माहिर हैं। दस साल पहले जब हर तरफ प्रधानमंत्री बन चुके नरेंद्र मोदी का जलवा-जलाल छाया हुआ था, तब उन्होंने 5 फरवरी 2015 को एबीपी न्यूज़ पर प्रसारित एक इंटरव्यू में कह दिया कि मोदीजी ने अपनी चुनाव सभाओं में हर किसी के एकाउंट में 15 लाख डालने की जो बात कही थी, वो एक जुमला थी। अभी पिछले हफ्ते शुक्रवार को उन्होंने अंतरराष्ट्रीयऔरऔर भी

अपने शेयर बाज़ार में बहुत सारी विसंगतियां हैं, सब कुछ आधुनिक ही नहीं, अत्याधुनिक हो जाने के बावजूद। साल में ट्रेड होने वाले कॉन्ट्रैक्ट की संख्या को आधार बनाएं तो हमारा एनएसई लगातार छह सालों से दुनिया का सबसे बड़ा डेरिवेटिव एक्सचेंज बना हुआ है। लेकिन इंडेक्स ऑप्शंस के वोल्यूम की गणना डेरिवेटिव सेगमेंट की पूरी ट्रेडिंग की गलत तस्वीर पेश करती है। वैसे, इसे डेल्टा आधारित बनाकर दुरुस्त की कोशिशें जारी हैं। फिर, अपने बाजार मेंऔरऔर भी

मोदी सरकार नए भारत की आकांक्षाओं को अतीत की अंधेरी गलियों की भूल-भुलैया में भटकाने में लगी है। भारत अभी दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था बना नहीं है। फिर भी वो ऐसा हो जाने का गला फाड़ रही है। उसने विकसित भारत@2047 को ‘अच्छे दिन’ का नया वर्जन बना दिया है। आखिर वो भारत की आंतरिक शक्ति पर फोकस क्यों नहीं कर रही? गांवों से लेकर शहरों तक लोगों की आय कैसे बढ़े, सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार काऔरऔर भी

आज जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी ताकत की धौंस दिखाकर लैटिन अमेरिका व यूरोप से लेकर एशिया तक के देशों को व्यापार युद्ध में धकेल दिया है, तब भारत को अर्थव्यवस्था के विकास की रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ेगा। हमें पता होना चाहिए कि अमेरिका ने पिछले साल 4.1 ट्रिलियन डॉलर के माल व सेवाओं का आयात किया था, जो दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारतऔरऔर भी