इस बार का बजट न तो सरकार के घाटा प्रबंधन और न ही कृषि या उद्योग के लिए अच्छा रहा है। जबरन सच्चाई से आंखें चुराई गई हैं। फिर भी हमारा शेयर बाज़ार शुरुआती झटका खाने के बाद पहले जैसा कुलांचे मारने लगा है। विदेशी संस्थाओं ने कुछ दिन बेचा, मगर फिर वे भी खरीदारी पर उतर आए। सोचने की बात है कि आखिर बाज़ार की इस कुतर्की चाल की वजह क्या है? अब सोमवार का व्योम…और भीऔर भी

बजट ने अर्थव्यवस्था को भले ही निराश किया हो, लेकिन शेयर बाज़ार थोड़ा-सा झटका खाने के बाद दोबारा बजट-पूर्व स्थिति में आ गया। सेंसेक्स अब भी 24.49 के पी/ई पर ट्रे़ड हो रहा है, जबकि उसका दीर्घकालिक औसत पी/ई अनुपात 18-19 गुने का है। जाहिर है कि निवेश की माकूल रेंज में आने के लिए बाज़ार को 25% से ज्यादा गिरना होगा। क्या यह संभव है? न भी संभव हो तो पेश हैं निवेश लायक दो कंपनियां…और भीऔर भी

जब बजट के एक दिन पहले आई आर्थिक समीक्षा में सितंबर 2014 में ज़ोर-शोर से शुरू की गई ‘मेक इन इंडिया’ योजना में संशोधन कर ‘असेम्बल इन इंडिया’ जोड़ दिया गया, तभी सकेत मिल गया था कि सरकार का मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने का इरादा अब ढीला पड़ गया है। सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ योजना शुरू करते वक्त लक्ष्य रखा था कि देश के जीडीपी में इसका योगदान 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 2022 तक 25औरऔर भी

आपको याद होगा कि सरकार ने कुछ महीने पहले टैक्स कटौती से कॉरपोरेट क्षेत्र को 1.45 लाख करोड़ रुपए का तोहफा दिया था। लेकिन आप नहीं जानते कि केंद्र सरकार ने निजी व सरकारी कंपनियों और मनरेगा जैसी सामाजिक स्कीमों व राज्य सरकारों का लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का बकाया दबा रखा है। वो यह बकाया चुका देती तो अर्थव्यवस्था में जान आ जाती। लेकिन वह तो एलआईसी से कमाना चाहती है। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

कमज़ोर अर्थव्यस्था का असर केंद्र के टैक्स-संग्रह पर दिख रहा है। चालू वित्त वर्ष 2019-120 में उसका निवल टैक्स-संग्रह लक्ष्य से 1.13 लाख करोड़ रुपए कम है। इसलिए नए वित्त वर्ष का लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है। शायद इसीलिए वित्तमंत्री ने सरकारी कंपनियां बेचकर 2.1 लाख करोड़ रुपए हासिल करने का मंसूबा बांधा है, जबकि चालू वित्त वर्ष के 1.05 लाख करोड़ के लक्ष्य में अब तक मात्र 18,094 करोड़ जुटे हैं। अब गुरु की दशा-दिशा…और भीऔर भी