आर्थिक विकास में घरेलू बचत का बड़ा योगदान है। लेकिन बजट में इसकी उपेक्षा की गई। जीडीपी को 8% बढ़ना है तो घरेलू बचत को इसका चार गुना, जीडीपी का 32% होना चाहिए। लेकिन यह 2012 के 36% से घटकर 30% से नीचे आ चुकी है। इसमें भी हाउसहोल्ड बचत दर 23% से 17% पर आ गई है। इसकी भरपाई विदेशी बचत करती है जिससे देश का चालू खाते का घाटा बढ़ता है। अब बुधवार की बुद्धि…और भीऔर भी

अर्थनीति मे राजनीति घुस जाए तो अर्थव्यवस्था का बेड़ा गरक होने लगता है। इस बार बजट में यही हुआ है। इसमें प्रभावशाली लॉबियों को प्रसन्न किया गया है। कॉरपोरेट क्षेत्र को पहले ही टैक्स में भारी रियायत दी जा चुकी थी। उसकी मांग थी कि लाभांश वितरण पर उसे टैक्स के झंझट से मुक्त कर दिया जाए तो यह झंझट आम निवेशकों पर डाल दिया गया। ये कदम अर्थव्यवस्था को उबार नहीं सकते। अब मगलवार की दृष्टि…और भीऔर भी

अर्थजगत का सबसे बड़ा सालाना सरकारी अनुष्ठान सम्पन्न हो गया। लेकिन शनिवार को आए नए वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में सुस्ती से घिरी अर्थव्यवस्था को उबारने का कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया। न उपभोक्ता मांग बढ़ाने के उपाय किए गए, न ही औद्योगिक निवेश बढ़ाने का प्रयास हुआ। ऊपर से कर-प्रणाली को उलझा दिया गया। निवेशकों पर लाभांश टैक्स देने का झंझट थोप दिया गया। आगे की राह बड़ी कठिन है। अब सोम का व्योम…औरऔर भी

दिक्कत यह है कि यूजीन फामा की थ्योरी केवल सिद्धांत में काम करती है। असल जीवन में इंसान तार्किक जीव के बजाय भावनात्मक प्राणी के रूप में काम करता है। वह डर, लालच, चिंता व घबराहट का शिकार होता रहता है। हम कभी भी शत-प्रतिशत तर्कों पर नहीं चला करते। भावनाओं में बहते हैं जिनके ज्वार का कोई सूत्र नहीं होता। इसलिए वित्तीय बाज़ार को किसी गणितीय समीकरण में नहीं बांधा जा सकता। अब गुरुवार की दशा-दिशा…औरऔर भी

वित्तीय बाज़ारों के बारे में एक मान्यता चलती है जिसे कहते हैं कुशल बाज़ार परिकल्पना या इफिशिएंट मार्केट हाइपोथिसिस। यूजीन फामा नाम के एक अमेरिकी प्रोफेसर की तरफ से पेश किए गए एक सिद्धांत में माना जाता है कि बाज़ार में शिरकत कर रहे सभी इंसान बेहद तार्किक ढंग से काम करते हैं। उनके पास बाजा़र की सारी ज़रूरी जानकारियां होती हैं जिनके आधार पर वे हिसाब लगाकर ट्रेड या निवेश करते हैं। अब बुध की बुद्धि…औरऔर भी